Anilkumar Rathwa (Sameer) 11 Feb 2026 कविताएँ समाजिक "खुद की गूँज" 6780 0 Hindi :: हिंदी
हथेली की लकीरों में छुपा, कोई राज नहीं होता, जो झुक जाए तकदीर के आगे, वो सरताज नहीं होता। माना कि वक्त की लहरें, कभी विपरीत बहती हैं, मगर काबिलियत ही है, जो तूफानों में डटकर रहती है। किस्मत तो बस एक जुआ है, कभी मिली कभी छूट गई, पर मेहनत वो नीव है, जो कभी न टूटी, न फूट गई। तू क्यों ढूँढता है सहारा, उन बेजान सितारों में? तेरी जीत का शोर छिपा है, तेरी अपनी हुंकारों में। भरोसा खुद पर कर इतना... कि खुदा भी तुझसे पूछ बैठे, तेरी रज़ा क्या है? बिना संघर्ष के मिली जीत की, भला मज़ा क्या है? कलम उठा अपनी मेहनत की, और खुद का भाग्य लिख डाल, सपनों के ऊँचे अंबर पर, अपनी काबिलियत की चीख डाल। जो आज अंधेरा गहरा है, तो सूरज बनकर तू निकलेगा, ये जो लोहा तपा है आज, कल कंचन बनकर निखरेगा। सपने पूरे होंगे तेरे, ये वादा है तेरी हस्ती का, बस भरोसा मत खोने देना, अपनी अंदरूनी शक्ति का।