महेश्वर उनियाल उत्तराखंडी 21 Jun 2026 कविताएँ प्यार-महोब्बत 4742 0 Hindi :: हिंदी
’’लहर उठी जवानी में‘‘ जानबूझ कर किया है तूने या हुआ नादानी में, मार के पत्थर कहां चली तू ठहरे हुए पानी में। मेरी दुनिया तो यारों बस एक अंधेरी रात थी तेरी आहट ने कर दिया रौशन वरना उजालों की क्या औकात थी। उठ रही है अब तो लहरें बनके सैलाव जवानी में, मार के पत्थर कहां चली तू ठहरे हुए पानी में। बांध ले मुझसे अपना बन्धन बात तू मेरी मान, सांसे मेरी थम रही है निकल रही है जान। चार चांद लगने को है अब हमारी कहानी में, मार के पत्थर कहां चली तू ठहरे हुए पानी में। ऐसा अजूबा क्या हुआ है जो देख रहा है जग सारा, प्यार की दुश्मन है ये दुनिया डरा जो इनसे, वो हारा। सूरज, चंदा, तारे मिलकर सब लगे निगरानी में, मार के पत्थर कहां चली तू ठहरे हुए पानी में। सुन ले फरयाद मेरी सब कुछ छोड़ के आजा, इस बार कोई पत्थर नहीं खुद मेरी लहरों में समा जा। फख्र करेगी दुनिया सारी हम दोनों की कुर्बानी में, मार के पत्थर कहां चली तू ठहरे हुए पानी में। रचनाकार - महेश्वर उनियाल 7579155644