Anilkumar Rathwa (Sameer) 11 Dec 2025 कविताएँ समाजिक "लक्ष्य की लपटें" 11139 0 Hindi :: हिंदी
हमेशा सोच जीत की रखो, हर मंज़िल का दरवाज़ा खुलता है; जो रातों में जलता रहता है, सुबह वही सूरज बनकर मिलता है। कदमों में दम, दिल में ज़ोर, और आँखों में सपना बड़ा रखो; तूफ़ानों से क्या डरना यार, जब भीतर हौसले का धधकता गढ़ा रखो। चोट लगे तो मन मत गिरने देना, घायल बाज भी उड़ जाता है; जो दर्द के संग जीना सीख ले, वो दुनिया से भी लड़ जाता है। काँटे चुभेंगे, राह रुकेगी, ये जंग हर विजेता की कहानी है; जो गिरकर भी उठ जाता है, वो ही असली तूफ़ान का ज्ञानी है। किस्मत की बात न करना तुम, वो केवल मेहनत वालों की सुनती है; जो दिन-रात खुद को तपाता रहे, उसकी जीत हर मुश्किल चुनती है। शोर मचाएँगी हार की बातें, पर तुम अपने कदम न ढीले करना; ये खेल उन्हीं का होता है जो आख़िरी साँस तक हिम्मत रखना। जब पसीना ज़मीन से टकराए, तो समझो — आकाश तुम्हारा होगा; जो आज जलते हैं भीतर से, वही कल दुनिया का सितारा होगा। और याद रखना — सोच अगर शेर जैसी हो, तो मंज़िल भी घुटनों पर आती है; क्योंकि जीत का स्वाद वही चखता है जिसमें हार को हराने की आदत रहती है।