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मां

Divya Jain 12 May 2026 कविताएँ प्यार-महोब्बत 4146 0 Hindi :: हिंदी

"मां"
           मां तुम ऐसी कैसी हो??
          मां तुम जब सुबह उठती हो।

     तो उलझे बालों को ऐसे बांधती हो जैसे
कंघी करने में न जाने कितना वक्त निकल          
                   जाएगा
सूरज शायद अभी निकला ही नहीं कि ढल    
                     जाएगा
भागती दौड़ती जाती हो रसोई में उस तैयारी के साथ
जो पहले रात तय किया कि टिफिन में कल क्या जाएगा?

हाथ पैर दिमाग सब एक साथ चिंता करते हैं कि क्या सब समय पर हो जाएगा??

        जब ये समय पर हो जाता है 
तब मां का एक सपना यूं पूरा हो जाता है।।

मेरा बिखरा सामान समेटते तुम अपनी थकान बढ़ाती  हो ।
                              
फिर भी सब जिम्मेदारियां सिर्फ अपनी समझ कर तुम बस करती जाती हो।

फिर आता है वक्त बाकी घर के कामों का
जिनको निपटाने में तुम हमेशा खुद को भूल जाती हो।

खुद को संवारना जैसे कोई काम निपटाने जैसा है
और फिर से थकान लेकर रसोई में सिमट जाती हो।

घर आने पर मेरे हंसी में अपना दर्द छुपाती हो
प्यार से बना खाना मुझे जी भरके खिलाती हो।

फिर से मेरी जिम्मेदारी तुझ पर शुरू हो जाती है
शाम होते होते तू फिर से रसोई में झौंकी जाती है।

बोझिल शरीर लेकर तू जब कमरे में आती है
दिन भर की थकान तेरी बातों में नजर आ जाती है।।

एक बात पूछनी तुमसे मां ..
मेरे जितनी थी जब तुम
 क्या तुम्हारा भी कोई सपना था??

वो सांसे भरके रोकर बोली,,
नहीं रे!  मेरा सपना ही अपना न था।।
                                  दिव्या जैन

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