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“माँ-बाप की खामोश मजबूरियाँ”

Anilkumar Rathwa (Sameer) 29 Nov 2025 कविताएँ समाजिक “माँ-बाप की खामोश मजबूरियाँ” 8398 0 Hindi :: हिंदी

हमारी अलमारी में तो नये कपड़े भरे रहते हैं,
पर माँ आज भी उसी घिसी चप्पल में चलती है…
क्योंकि उसे डर है कि कहीं
उसके एक नए जोड़े से
हमारी किसी ज़रूरत में कमी न आ जाए।

पापा की शर्ट का कॉलर वर्षों से टेढ़ा है,
पर उन्होंने कभी शिकायत नहीं की…
क्योंकि उन्हें लगता है
कि हमारे सपने उनसे कहीं बड़े हैं,
हमारी खुशी उनसे कहीं ज़्यादा अनमोल है।

हम तो बस माँ-बाप से मांगते ही रहते हैं—
“माँ ये दिला दो…”
“पापा ये चाहिए…”
पर क्या कभी हमने पूछा
कि उनके अपने मन की लिस्ट में
कितनी चीज़ें बरसों से अधूरी पड़ी हैं?

एक दिन हिम्मत कर पूछ लिया—
“पापा… हम तो मांग लेते हैं,
पर आप आखिर लाते कहाँ से हो?”

पापा की आंखें भर आईं,
हाथ मेरे सिर पर रखा और बोले—
“बेटा… हम पैसे कमाते नहीं,
हम तो तुम्हारी मुस्कान खरीदते हैं…
और जहाँ हमारी जेब छोटी पड़ जाए
वहाँ हम अपनी इच्छाएँ गिरवी रख देते हैं।”

माँ पास आकर बोली—
“हम गरीबी से नहीं डरते बेटा,
पर तुम्हारी कमी से डरते हैं।
हमारे ज़ख्मों का दर्द कम हो जाएगा,
बस तुम्हारा चेहरा मुस्कुराता रहे।”

हम देर से समझते हैं—
कि माँ-बाप की घिसी चीज़ें गरीबी नहीं,
बल्कि हमारी खुशियों की कीमत होती हैं।

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