Anilkumar Rathwa (Sameer) 18 Dec 2025 कविताएँ समाजिक “माँ-बाप" 10068 0 Hindi :: हिंदी
ज़िंदगी तब तक हल्की सी लगती है, जब तक हर बोझ माँ-बाप उठाते हैं। हम धूप में भी सुकून ढूँढ लेते हैं, क्योंकि वो अपने हिस्से की छाँव गंवाते हैं। हमारे सपनों की ईंट-ईंट के नीचे, उनकी टूटी हुई उम्मीदें दबी होती हैं। हमारी मुस्कान सस्ती लगती है शायद, पर उसके दाम में उनकी उम्र कटी होती है। कभी नई चप्पल हमारे पैरों में, तो कभी घिसी हुई उनके हिस्से में आई। हमारी ज़िद्द को इज़्ज़त कहते रहे वो, और अपनी ज़रूरत हर बार भुलाई। वो थकते हैं, पर बताते नहीं, दर्द रखते हैं, पर जताते नहीं। घर की दीवारें मज़बूत रहें, इसलिए अपने कंधे झुकाते नहीं। जिस दिन ज़िम्मेदारी हमारे कंधों पर उतर आती है, उसी दिन समझ आता है— माँ-बाप की ख़ामोशी भी कितना भारी बोझ उठाती है।