Anilkumar Rathwa (Sameer) 17 Oct 2025 कविताएँ समाजिक "माँ की ख़ुशी" 13487 0 Hindi :: हिंदी
माँ की ख़ुशी कोई बाज़ार की चीज़ नहीं, वो तो दिल के किसी कोने में रखी परछाई है, जिसे छूना तो आसान नहीं, पर महसूस हर सांस में की जाती है। सुबह की पहली किरण से पहले, माँ की आँख खुल जाती है, बच्चों की नींद न टूटे कहीं, इस सोच में उसकी रात कट जाती है। रोटियाँ गोल न हों तो हँस लेती है, पर बच्चों की आँखों में आँसू न देख पाती है, अपने हिस्से का कौर भी छोड़ दे, अगर बच्चा भूखा रह जाए तो। माँ की ख़ुशी महलों में नहीं, बल्कि रसोई की खुशबू में बसती है, जहाँ वो पसीना बहा कर भी, हर थाली में प्यार परोसती है। जब बेटा कहता है, “माँ, आज मैं कुछ बड़ा कर दिखाऊँगा,” तो उसके चेहरे पर गर्व का सवेरा छा जाता है, और जब वही बेटा उसके पैरों को छू ले, तो उसका मन स्वर्ग तक पहुँच जाता है। माँ की ख़ुशी उसकी बेटी की हँसी में है, बेटे के सफल होने की खबर में है, भले खुद थक जाए रास्तों में, पर बच्चों के सपनों में उसकी उमंग है। न कोई ताज चाहिए, न कोई नाम, बस अपने बच्चों का स्नेह और सम्मान, यही तो माँ की दौलत है, यही उसका मान। वो न शिकायत करती है, न कोई दावा, हर दुख में भी कह देती है — “मैं ठीक हूँ बाबा।” क्योंकि माँ की ख़ुशी अपने बच्चों की साँसों में रहती है, वो खुद मिटकर भी उन्हें संवारती है। माँ का दिल समंदर जैसा गहरा, जहाँ दर्द भी मोती बन जाता है, और उसकी एक मुस्कान — भगवान से भी बढ़कर लगती है।