MONTI 01 Jan 2026 कविताएँ हास्य-व्यंग #हिंदी साहित्य #कविताएं #शायरी #महत्वाकांक्षाएं 9622 0 Hindi :: हिंदी
महत्वाकांक्षाएं । प्रातःकाल धुएं के समान मेरे पास के वातावरण में छाई हुई है हल्की सी ओश , ये ओश की बूंदे मोतियों के समान बिखरी हुई है हरी-हरी घासों पर और यह घास उगी हुई है खेतों की मेढ़ पर सेनानी की तरह, ठंडी हवाओं के झोंके मेरी सफेद कमीज को भेदते हुए स्पर्श कर रहे हैं मेरी आत्मा को, और मेरी आत्मा खिल उठी है इस सफेद कमीज के रंग की तरह, पेड़ मानो कर रहो हो मुझ से प्रतिस्पर्धा आगे निकल जाने में, क्योंकि अबाधित गति से चलती हुई एक बस में बैठा हुआ मैं अपनी यात्रा में विद्यमान हूँ, यह यात्रा केवल मनुष्यो की यात्रा नहीं है अपितु अनंत महत्वकांक्षाओं, स्वप्नों , उम्मीदों और आशाओं की यात्रा है, मैं जिस बस में बैठा हुआ हूं उस बस मे बहुत से आदमी और औरतें है साथ ही बहुत से युवा नौजवान साथियों का एक उन्माद सुनाई पड़ रहा है, पर मुझे इन युवाओं में युवा कम ,अनंत संभावनाओं से घिरी महत्वकांक्षाएं दिखाई दे रही है, कुछ युवा अपने सपनों को साकार करने के लिए कॉलेजों और विश्वविद्यालयों की ओर कूच कर रहे है, आदमी अपने पेट के अधीन रोटी के प्रबंध के लिए निकल पड़े है कामों पर, और महिलाएं जो घरों से निकलकर पुनः घरों पर जा रही है, कुछ काम पर और कुछ अपने परों को उड़ान देने के लिए जा रही है विद्या के देवालयों की तरफ, पर न जाने क्यों मुझे इन युवाओं में युवा नहीं दिख रहा , औरतों में औरतें नहीं दिख रही, मानो इन्हें बांध दिया गया हो एक निश्चित परिधि में, जैसे बांध दिया जाता है बैल को कोल्हू से जो बिना रुके निरंतर लगाता रहता है चक्कर एक ही परिधि में, ठीक वैसे ही यह सब लोग मानो बंधे हैं महत्वकांक्षाओं की डोर से और लगा रहे है चक्कर जीवन के एक छौर से दूसरे छौर पर, पर इस यात्रा में यह सब लोग शून्य मात्र हैं इन सब की यात्राओं से कहीं अधिक यात्रा करती हैं इनकी महत्वाकांक्षाएं, और इसी दौड़ में शामिल हूं मैं भी या कहूं कि मेरी महत्वाकांक्षाएं? ~Monti Dulgach ✍️