Rajnish khandal 18 Mar 2025 कविताएँ समाजिक 34055 0 Hindi :: हिंदी
गावा री अब सान घटी ,
शहरा री अब आन बढ़ी।
झठे धोती आला डोलता,
बठे जिन्सा री अब जेट बढ़ी।
मिट्ग्या सारा पीपल गट्टा,
मिट्गी गट्टा री सान अब।
मूछ मरोड़ जका छाती ठोकता,
बा मुच्छया रो अब ताव घट्यो।
अब बात्या आला झूफ्फा मिट्ग्या,
और मूज्जा आला माचा मिट्ग्या।
ओ देसी राजस्थान हो जठे सु,
बाजरा रो अब रोट्टो मिट्ग्यो।
बो होली रो अब चंग मिट्यो,
और बड्गा रो अब संग मिट्यो।
रेवड़ लिया जका डोलता,
बा चरागाहा रो मृदंग मिट्यो।
ई दुनिया स्यू व्यवहार मिट्यो,
और नोटा स्यू अब मान बढ्यो।
आज कलजुग घोर आग्यो जठ्ठे,
मोबाइल स्यू मान बढ़े।
कपटी, कुलीन, कुविचारा वाली,
अब तो आ संस्कृति बढ़ी।
बड्गा बेठ्या रेग्या जाका की,
अपने हत्था स्यू शान घठ्ठे।
पर इन ना कोई समझ सक्यो कि,
आपा सिर रो ताज छोड़ तुम्मो चुन्यो।
~ रजनीश खाण्डल