प्रवीण कुमार 10 Oct 2025 कविताएँ दुःखद 18464 0 Hindi :: हिंदी
मेहनत न करूं , फिर तो पसीना नहीं आता । बिना पसीने के हवा में बैठ सकूं । आखिर कब- तक यूंही बैठ सकूंगा। मुझे ही नहीं, कोई दूसरे भी होंगे। जिन्हें मुझ पर अफसोस होगा। मेहनत न करूं , फिर तो पसीना नहीं आता। ज़िन्दगी दौड़ भी बन गई। ख़ुद को बेहतर करने में जंग भी। नये-2सिलशिले बने। नये-2ढ़ग भी। तोड़ दिए मेहंगाई के पैमाने भी। बदलें नहीं ज़िन्दगी के रंग भी। बेकारी तो भिखारी ही है। सामने से भी - हर दरवाजे पर नज़र आ गई है। मेहनत न करूं, फिर तो पसीना नहीं आता। तारीफ़ तो हर कल की है । नहा-धोकर निकल पड़े हैं। कि वो कोई शाम हमारी होगी। मेहनत न करूं, फिर तो पसीना नहीं आता।