Kirti singh 30 Mar 2023 कविताएँ समाजिक फटी झोपड़ी फटी केवाड़ फटी हुई छत के नीचे 114722 0 Hindi :: हिंदी
फटी झोपड़ी फटी केवाड़ फटी हुई छत के नीचे फटी हुई खाट पर सो रही थी मैं अपने मां के पास नेत्रहीन मेरी मां बोली लाडो ला पानी ,मैं झट खड़ी हो बोली मैं ले आती हूं पास की बावड़ी से पानी ,एक छोटी बाल्टी मैं ले दौड़ी बावड़ी के पास वहां ले रहे थे बड़ी जाति के लोग पानी मैं सोची ना लेने देंगे अब यह मुझको पानी दौड़ पड़ी मै दूर बड़ी बावड़ी ढीली डोरी और भरली बाल्टी ले चली में घर को पानी होली का त्योहार बड़ा था रंगों में सब रंगे पड़े थे इतने में दो काले भेड़िए ने रोका था मेरा रास्ता कर दिया मुझको भी काला फिर भी भरी बाल्टी ले आई मैं घर के चौखट पर मां खाट पर बोल रही पानी पानी मैं झट खाट पर बैठ रोकर बोली लो मां पी लो पानी मां ने अपनी प्यास बुझाई और बोली इतनी देर कहां लगाई मैं मुख से कुछ ना बोली जा एक कोने में फटी साड़ी में में मुंह छुपा कर दबी सांसो को लेकर बैठी वहीं फटी केवाड़ से झांक रही थी फटी हुई किस्मत हमारी बची हुई थी जो मेरी साड़ी वह भी अब फट गई थी सारी कटकर मर जाने का जी कर रहा था मेरा मगर खाट पर लाचार पड़ी थी मां हमारी रुक गई थी मैं बस वही लाचारी. Kirti singh