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रूप-शिखा

Jitendra Sharma 19 May 2026 कविताएँ समाजिक Roop Shikha kavita, रूप शिखा कविता, Roop Shikha poem, Jitendra Sharma kavita, Hindi poetry recitation, Hindi literature, heart touching hindi kavita, schedule podcast hindi, best hindi poems, kavi sammelan, sound of poetry, hindi shayari status, poetry, Hindi kavita podcast, Beautiful Hindi poem, Nabh se utri surnari ho, नभ से उतरी सुरनारि हो, kanchanka ki pratima koi, chanchal aankhein kavita, 4369 0 Hindi :: हिंदी

नभ से उतरी सुरनारि हो, या कंचन की प्रतिमा कोई, 
शरद चंद्र की धवल धार, मृदु स्वप्नों में खोई खोई। 
मृग-शावक सी चंचल आँखें, कजरारे घेरों में बद्ध बंद, 
अधरों पर बहती रहती है, मधुमय गीतों की मकरंद।
मंद मंद मुस्कान लिए, इठलाती सी बलखाती सी, 
मंदिर के पावन दिए की, जलती हुई उज्जवल बाती सी!
शीश मुकुट सम जूड़ा सोहे, कुंतल जैसे घनी रात, 
माथे पर बिंदिया चमक रही, ज्यों उदित हो रहा सुप्रभात्। 
स्वर्ण आभा सी देह यष्टि, साड़ी के रेशम में लिपटी, 
कवि की सुमधुर कल्पना सी, धरातल पर अनुपम सृष्टि।
वाणी में मिश्री सी घुली हुई, कोकिल सा कंठ सुरीला है, 
उसका हर शब्द समर्पण है, उसका हर भाव रसीला है। 
नव नूतन हृदय उसका , करुणा की कोमल छाया है, 
निश्चल मन के दर्पण में, वह ईश्वर की सुंदर माया है। 
अभिमान रहित वह गरिमा है, शील-शक्ति का संगम है, 
उसके पावन आचरण में, संस्कृति का भव्य अनुक्रम है।
गठित गात पर नील वसन, ज्यों मेघों में बिजली चमक रही, 
कनक वरण मुखमंडल पर, यौवन की लाली दमक रही। 
पायल की झंकार सुरीली है, वीणा की तान सुनाती है, 
वह चलती है तो धरती भी, धीमे धीमे मुस्कुराती है।
वह रूप-शिखा, वह ज्योति-पुंज, श्रद्धा की मूरत पावन सी, 
इस पाठ के लिये पोडकास्ट तपती धरती के सीने पर, ज्यों सुखद फुहारें सावन सी। 
निश्चल, निर्मल, अविरल धारा, सौंदर्य का वह बहता सागर, 
तृप्त हो गई रिक्त चेतना, उसकी एक झलक को पाकर।

शब्द रचना- जितेन्द्र शर्मा

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