Amarnath Yatra 29 Nov 2025 कविताएँ समाजिक स्त्री इतनी कैद है 9288 0 Hindi :: हिंदी
स्त्री इतनी क़ैद है कि उसके चारों ओर नज़रें हैं, दीवारें हैं, रिश्तों के नाम पर लगी हुई ज़ंजीरें हैं। हर सुबह वह उठती है, सबके लिए चाय बनाती है, अपने ही घर में सबसे आख़िर में याद की जाती है। उसकी थाली में हमेशा ठंडी रोटी आती है, पर उसकी मुस्कान फिर भी गरम रहती है। लोग कहते हैं – “घर ही तेरी असली जगह है”, वह चुप रहती है, पर उसके सपनों को कोई कोना नहीं मिलता। उसकी आँखों के भीतर एक पूरी दुनिया कैद होती है, जो हर रात तकिये पर टूट जाती है। फिर भी वह हार नहीं मानती, अपने लिए एक छोटा सा दरवाज़ा ढूँढती है। वही दरवाज़ा है – नौकरी। जहाँ उसका नाम सिर्फ़ किसी की बेटी या पत्नी नहीं, उसकी अपनी पहचान बन जाता है।ऑफिस की कुर्सी पर बैठकर जब वह फ़ाइलों के बीच मुस्कुराती है, तो उसे लगता है, क़ैद की दीवार में एक दरार सी पड़ गई है। पहली तनख़्वाह के साथ वह सिर्फ़ पैसे नहीं संभालती, वह अपने सपनों को धीरे से जेब में रख लेती है। शायद यह पूरी आज़ादी नहीं, पर यही उसका पहला क़दम है। स्त्री इतनी क़ैद है कि उसने मजबूरी में नहीं, ख़ुद को बचाने के लिए नौकरी को आज़ादी चुना है।