Anilkumar Rathwa (Sameer) 04 Feb 2026 कविताएँ समाजिक "शब्दों का मोल" 7515 0 Hindi :: हिंदी
कलम चाहे हज़ार हों, पर बात क्या होगी? जो शब्द ही न पास हों, तो शुरुआत क्या होगी? सजी हों अलमारियाँ, पर रूह ही न हो, तो कागज़ों के साथ फिर, मुलाक़ात क्या होगी? दुकान से तुम खरीद लो, हज़ारों रंग की स्याही, मगर ये मौन लिख न पाए, दर्द की गवाही। कलम तो बस एक जिस्म है, जो साँस माँगता, बिना अर्थ के तो हर लिखावट, है बस तबाही। पकड़ सको जो थाम लो, तुम भाव का सिरा, बिना भाव के कलम की, औकात क्या होगी? जो शब्द ही न पास हों, शुरुआत क्या होगी? कोई तो टीस उठे हृदय में, जो हाथ काँप जाए, कोई तो आग शब्द बनकर, पन्नों पे फैल जाए। सोने की निब भी रेत है, गर चेतना न हो, सन्नाटा ऐसा हो कि फिर, आवाज़ हार जाए। मिटा सको जो बाँट लो, तुम मन का कोरापन, वरना कलम के साथ फिर, ये रात क्या होगी? जो शब्द ही न पास हों, शुरुआत क्या होगी?