Santosh kumar koli ' अकेला' 29 Dec 2024 कविताएँ समाजिक तैयार रहो 26984 0 Hindi :: हिंदी
जन्म लेने वाला, एक दिन मरता भी है। उदित, अस्ताचल को जाता भी है। जो खिला, वह मुरझाता भी है। गले जो मिला, वह बिछुड़ता भी है। बुढ़ापा हाथ मिलाता, जिसका आज यौवन है। यही, तो जीवन है। बड़े रिकॉर्ड़ जो बने, वे टूटते भी हैं। लूटने वाले, एक दिन लुटने भी हैं। सावन और जेठ, गले मिलते भी हैं। जीवन मोती, टूटकर बिखरते भी हैं। उत्थान का अंत, निश्चित पतन है। यही, तो जीवन है। जो पाता, वह गॅंवाता भी है। आरंभ, अंत में समाता भी है। अर्श, फर्श पर लुढ़कता भी है। प्रिय, दिल में, खटकता भी है। रात को, गले लगाता दिन है। यही, तो जीवन है। यही, तो जीवन है।