संदीप कुमार सिंह 07 Jun 2026 कविताएँ समाजिक मेरी यह कविता हौसला अफजाई करते हुए जीवन के कठिनाइयों से लड़ने में मदद करेगी. और आपको आपकी मंजिल से मिलायेगी.अतः एक बार आप पाठक गण अवश्य पढ़ें. 684 0 Hindi :: हिंदी
तोड़ हार की जंजीरों को समाँ जीत का, बाँधों तुम कहाँ अकेले खोये से हो त्याग शोक को, जागो तुम। युवा शक्ति हो,युवा जोश हो बादल के गर्जन का घोष हो, सघन ज्वाल की लपटें हो तुम फिर क्यों ऐसे पड़े मदहोश हो। कहाँ भटकते गलियों में हो अम्बर है आवास तुम्हारा, तारों संग है सभा तुम्हारी तुम बिन सूना आकाश है सारा। तुम भविष्य की अभिलाषा हो सूखे चेहरों की आशा हो, श्रेष्ठ राष्ट्र की श्वाँस हो तुम बल पौरुष की परिभाषा हो। शस्त्र तुम्हारा स्वाभिमान है इसका तुम संधान करो, योग साधना में रत होकर शक्ति का आह्वान करो। कोशिश करना धर्म तुम्हारा फल की चिन्ता त्यागो तुम, इतिहास देखता राह तुम्हारी उठो, लक्ष्य को साधो तुम। (स्वरचित मौलिक ) संदीप कुमार सिंह*Author*
I am a writer and social worker.Poems are most likeble for me....