Samir Lande 29 Apr 2023 कविताएँ समाजिक Samir Lande, समीर लांडे, जाली मुखोटे, सामाजिक, प्रेम, love, 32909 0 Hindi :: हिंदी
जाली मुखोटे हे यहा सारे,
हर कोई एक छलावा है!
दिखावे की अच्छाई ,
अंदर से ये काले है!
क्या डरना है गैरो से,
अपने ही लुटेरे है !
गैर तो लुटे सही रुलाकर,
अपने हसकर लूटते है !
- समीर लांडे