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टिकाकरण अधिकार अपना
कर्म योग अती पावन निष्ठा, छल भी छलीत हो जाती है! बलवान कि हिम्मत भी आकर, अधरों मे दलीत हो जाती है!! पर्वत कहां झुकते है नदियों
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ভারত বিজয়ী পথে
সোনার মনে স্বর্ন স্বপনো, চলে চোখের বনে! সান্ধিন্তার ই সারা ভারত, ভিন্জে সে সাবোনে!! কর্মো গড়িতে দিলো আবাজ, স্বর্ন �
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कर्म का अभिनंदन
धरा धरी वीरों कि गती से, है दृश्य चेतना चंचल सी! कंचन है जगत के कथित कथा , और पावन जग के कर्म सभी!! चलती है हवा ले कर जगती का,
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वशुधा-अम्बर का अचल साथ
कर लाख कोशिशें शिद्दत कि, मुद्दत से पाए राह किरण! वशुधा-अम्बर का अचल साथ, दे रही किरण इस वशुधा पर!! पर किरण न कोई पंख रखे,
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चलकर गिरना गिरकर चलना
चलों तो राह हर वक्त नयी, क्या धरा पड़ा दोहराने मे! चलकर गिरना गिरकर चलना, है धरा पड़ा नज़राने मे!! खाकर ठोकर गिरता है मनुज,
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भारत को अचल संतृप्त करूं
कहता अभिनन्दन कर अभीवादन, ज़रा तम अधरों को दिप्त करुं! भरकर उजियारा अंधकार मे, धरा को ज्ञान से लिप्त करूं!! धरती कि शख्तियां
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गर देख लिया क्या बुरा किया
गर लाख कोशिशें हो शिद्दत कि, तब मिलतें हैं दो चार नज़र! चलतें ही रहें कर ध्यान मग्न, मंज़ील के राह कि डगर- डगर!! कभी व्यस्त मिलें
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हर राहों मे युंहीं चले चलो
व्यथा को बनाकर दिप्त दिप्त, हर राहों मे युहीं चले चलो! चाहत को दबाकर हृदय मे, विश्व को तुम धारण कर लो!! व्यथा चाहत का अमर कुंज,
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कलम
गलत शब्दों का कागज पर उतारना कलम का दोष नहीं यह तो लिखने वाले की सोच और कलम चलाने के ढंग पर निर्भर करता है ।
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अपमान
अपमान करने के लिए बुरे शब्दों की जरूरत नहीं होती, किसी को बुरी निगाहों से देखना भी उसका अपमान होता है । पंकज कुमार बूडाकोटी
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तज़ुर्बा
तजुर्बा से कोई मोहब्बत नहीं होती किसी से बेपनाह मोहब्बत करके हर तरीके का तजुर्बा प्राप्त होता है। लेखक पंकज कुमार बुड़ाकोटी
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सुख दुख
एक सुख को प्राप्त करने के लिए हजारों दुखो का सामना करना पड़ता है, फिर भी मनुष्य खुश नहीं रह पाता है किसी भी चीज की अत्यधिक कामना करना सफ�
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