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व्यापार
व्यापार मात्र वस्तु का लेनदेन तक ही नहीं बल्कि रिश्तो कभी जरूरत के हिसाब से लेनदेन करने से है लेखक पंकज कुमारबुड़ाकोटी
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कुदरत
कुदरत ने जीना सीखा हमने यही हमारी धरोहर है जिसने किया अपमान इसका वही पूर्ण विरोधी है लेखक पंकज कुमार बुड़ाकोटी
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सार्थक जीवन
था कर गुज़रने का जज़्बा, ज़िंदगी पल भर की। अग्नि में तपकर एक लोहा, फाल बन गया हल की। धरती के दामन के संग, कृषक का हमराही। घिस -घिसके घिस ग�
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समाज
एक अच्छे समाज की कल्पना करने वाले दूसरों को तो प्रेरित किया करते हैं परंतु खुद को प्रेरित करने की आदत से वंचित रहते हैं भूल जाते हैं �
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राधे राधे बोलिए
राधे-राधे बोलिए, मन के द्वार खोलिए, राधे-राधे रस कानों में घोलिए। जय श्री राधे
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रिश्ता
एक रिश्ता है अपने आप से मेरा जिसे समझने में जिंदगी लग जाती है खुद से बढ़कर कोई फिक्रदार नहीं मेरा धीरे धीरे ये बात समझ में आती है जिन �
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दुनिया
दुनिया में रिश्तो से ज्यादा पैसों की अहमियत है चंद रुपयों की खातिर अपनो को शरेआम कत्ल होता है, और रुपयों के खाते हैं बेगानों को अपना बन
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किताब
किताबी ज्ञान से बढ़कर जीवन का संघर्ष हमें सिखाता है कि कब, कहां और किस परिस्थिति में हमें खुद कैसे हल ढूंढना है. लेखक पंकज कुमार बुड़ाक�
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भारत को अचल संतृप्त करूं
कहता अभिनन्दन कर अभीवादन, ज़रा तम अधरों को दिप्त करुं! भरकर उजियारा अंधकार मे, धरा को ज्ञान से लिप्त करूं!! धरती कि शख्तियां
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रश्मी रथी
भगवे का धारन करूण धरा , अविचल धरती सम्मानी हैं! है विश्व को देता अजय दान, सूर्य दया का दानी हैं!! स्वर्ण रथ को धारण कर,
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অমর্তবের আবাজ
আবাজ মনের জা মীটী নেই, ও হৃদযের বেদনা অমর থাকে! জা কর্ম পথ দিযে সোরী নেই, ও নাম ধরা তে অমর থাকে।। নিজ ব্নদন তে অভীন্নদন দে, �
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পরম সু:খম সন্তাপ করম
পরম সূ:খম সন্তাপ করম, অভিদা , নিবিদা পরবস্তী তে! এই মনের নগরকে উচ্চো রাখে, কোতোই বেদনা হারিযে দে।। আপ: হৃদয জোদী কষ্ঢে থাকে,
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