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गहरा समुद्र में साहिल की तलाश
ज़िंदगी ख़ुशी- की आश लिए व़क्त की, रहनुमा में गुज़रता जाता है,, गहरा समुद्र- में साहिल की तलाश तक..!! -मोती
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वो गुमनाम हथेलियां-बदनाम कर गई
वो गुमनाम हथेलियां बदनाम कर गई। कहां की सुबह कहां की शाम कर गई। सोचा था, सितारों में मेरा नाम होगा तुम्हारी खोज में जिन्दगी हराम हो �
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आँसुओं के पत्ते-सब मुरझा गए हैं
आँसुओं के पत्ते सब मुरझा गए हैं मेरे आँसुओं के पत्ते न हैं वो यार मेरे न पास कोई दिल इंसान हूँ पत्थर भी तो नहीं, जाँ हैं मेरे सीने के अ�
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बिन मौसम बरसात- रहा तुम्हारा साथ
बिन मौसम बरसात, रहा तुम्हारा साथ जीने की अनुकंपा में जुड़ा रहा अध्याय बड़ी जटिलता की बेड़ी से थामा तुम्हारा हाथ शान्त और अति क्लान
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अपनों में आरजू लिए-सपनों में वादें किए थे
अपनों में आरजू लिए अपनों में आरजू लिए सपनों में वादें किए थे जबां पे इक नाम लिए कई दोपहरी लिखते रहें इस क़दर तोड़ा वो दिल पास नहीं दू
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क्रांतिकारी - राव तुलाराम
राजा राव तुलाराम , जिसकी 1857 की जंग देखकर दंग रह गए अंग्रेज सीबपुर के मैदान में हुई इस जंग में अंग्रेज जीत तो गए , लेकिन राव तुलाराम को नही�
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मेहनत-मेहनत का फल
जब मेहनत का फल ना मिले, तब मेहनत करने वाले का दिल टूटे, इस बात से दुनिया वाले नहीं है अछूते। फिर मेहनत करने वाले को फल क्यों देते हैं अधू
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सावन आया है-रिमझिम बूंदों को लेकर
सावन आया है रिमझिम बूंदों को लेकर काली घटाओ को लेकर भिगाने आया है सावन आया है धरा व्याकुल थी जलचर व्यथित थी तृप्त कराने आया है साव�
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कलियुग के इंसान में-मची भयंकर होड़
दोहा छंद कलियुग के इंसान में,मची भयंकर होड़। भागम भाग विशेष है,दिखते हैं बेजोड़।। (स्वरचित मौलिक) संदीप कुमार सिंह ✍🏼 जिला:_समस्तीपु
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सपने सारे तब खिले-जीवन हो शहतूत
दोहा छंद सदा असन चित से करें,रहे वदन मजबूत। सपने सारे तब खिले,जीवन हो शहतूत।। (स्वरचित मौलिक) संदीप कुमार सिंह✍🏼 जिला:_समस्तीपुर(देव�
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नयनों की सीमा रहे-मिले खुदबखुद प्यार
दोहा छंद नयनों की सीमा रहे,मिले खुदबखुद प्यार। करते तब इजहार भी,फिर होता स्वीकार।। (स्वरचित मौलिक) संदीप कुमार सिंह✍🏼 जिला:_समस्तीप
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एक सोबती असावी-जीवनात साथ फक्त चार भिंतींची नसावी
एक सोबती असावी, जीवनात साथ फक्त चार भिंतींची नसावी. ऐनवेळी तर सावली पण साथ सोडते म्हणा, शेवटी या थर थरत्या हातात , हात देणारी एक कुणी त�
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