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खुद से लड़ रही हूं।
खुद से लड़ रही हूं, दूसरो को खूब हसाती हूं, अब खुद को हंसाने की कोशिश कर रही हूं, जीवन के इस संघर्ष में, मै खुद से ही लड़ रही हूं। भले ही सर
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गज़ल
हमने ताजो तख्त को पलटते देखा है। और पत्थर को खुदा बनते देखा है। जीत मेरी तकदीर की मोहताज नहीं हमने समंदर को बारिश बनते देखा है। बस थ�
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दोस्ती
दोस्त वो है जो थाम के रखता हैं हाथ परवाह नहीं उसको कोन है तुम्हारे साथ उसकी आंखों में चमक दिखती हैं जब होती हैं हमारे साथ गुज़र जाता �
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दोस्ती
दोस्त वो है जो थाम के रखता हैं हाथ परवाह नहीं उसको कोन है तुम्हारे साथ उसकी आंखों में चमक दिखती हैं जब होती हैं हमारे साथ गुज़र जाता �
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बचपन के दिन अब याद आते है
बचपन के दिन अब वो याद आते है वो गलियां वो चौबारे अब हमे बुलाते है। मिट्टी के वो गुड्डा और गुड़िया जाने क्यों हम बनाते थे घर घर से मिट्ट�
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ये जिम्मेदारियां ही तो है जो इंसान के साथ चलना सीखा सीखा देती हैं
ये जिम्मेदारियां ही तो है जो इंसान को वक्त के साथ चलना सीखा देती है हालात कैसा भी हो लड़खड़ाने के बाद सभलना सीखा देती है कोई गिरता हैं �
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मां
* जिसके होने से में ख़ुद को मुक्कमल मानती हूं में खुदा से पहले अपनी मां को जानती हूं। * मुझे माफ़ कर मेरे यां खुदा झुक कर करू ते
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आड़ की बाड़
वचन की आड़ कैकयी, मांगी वनवास रघुवर का। महाबलि बालि को मारा, राम ले परदा तरुवर का। इच्छा मृत्यु भी मृत्यु मांगे, परदा शिखंडी तुवर का। स
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नई साल की बधाई
बहुत कुछ सिखाया आपने हमे आते जाते। बार बार लो बिदाई तुम भी अब जाते जाते। अपनों का तुमने रंग दिखा के बताया। सबको एक जैसा सत्य पर है चल�
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अटल बिहारी को प्रणाम!
उबड़ खाबड़ पथरीली राहों पर, जो खूब चले और अटल रहे! उन अटल बिहारी को प्रणाम! उन अटल बिहारी को प्रणाम! राष्ट्रभक्ति और समर्पण को उद्देश्�
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कविता = ( भीड़ )
#माननीयश्रीअटलबिहारीवाजपेई माननीय श्री अटल बिहारी वाजपेई जी के सुशासन दिवस पर उनके चरण कमलों में समर्पित मेरी यह रचना कविता = ( भीड़ )
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जिम्मेदारियां
कविता-जिम्मेदारियां जिम्मेदारियां एक बोझ है ढोने वाले पर लद जाते हैं, ना ढोने वाले को नासमझ/ नालायक/ आवारा लोग कह जाते हैं, जिम्मे�
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