शरद भूषण मोंगरा 24 Apr 2026 शायरी धार्मिक रूहानियत, भीतर गहरे में, परमात्मा, ईश्वर, 5844 0 Hindi :: हिंदी
"रूहानियत के लिए", वो नूर (ईश्वर) मेरे भीतर है, मैं (अहं) मानती नहीं है रूह रोज़ अपने रब के सजदे से चूकती है। इश्क खुदा की जात है इश्क कि डोर कमाल । जिसने जाना है इशक को हो गया मालामाल।। उसकी दुनिया में बुद्धू बन के चल शायद तेरे पाप कम हो जाएं। अल्लाह अल्लाह सब करें अल्लाह का घर दूर। अल्लाह बैठा आपमे सब जग मद में चूर।। वो मेरा बाप है भरकर निवाला देता है कि मैं बेशर्म हूं ताउम्र पड़ा सोता हूं। माया का संसार है, कर्म रहे हैं हार। लालच में है खो गया, अब अपनों का प्यार।। है मुझे काम क्या तेरे सिवा जमाने में तू ही बसता है मेरे रात दिन वीराने में। दुनिया की चिराग बत्ती जलाता रहा ताउम्र मैं झूठ में खुदा को बताता रहा ताउम्र रब जोत जल रही है इस जिस्म के मंदिर में मैं बाहर के शंख घंटे बजाता रहा ताउम्र। शरद भूषण मोंगरा कवि शायर गीतकार लेखक।