Dr.sandeep kumar 10 Jul 2026 आलेख हास्य-व्यंग #बाबू व्यंग #व्यंग कहानी 198 0 Hindi :: हिंदी
बाबू ,जिनको लोग प्यार और सम्मान से बाबूजी भी कह देते हैं। सरकारी और प्राइवेट सभी कार्यालयों में उपस्थित एक अलग ही प्रकार का प्राणी होता है। यह वही बाबू होते हैं, जिनकी वजह से विभाग दिन-रात उत्तरोत्तर उन्नति करता चला जाता है, क्षमा करें विभाग नहीं विभागीय अधिकारी।
देश में रहने वाले हर व्यक्ति का कभी न कभी इनसे आमना-सामना हो ही जाता है।इसलिए देश की जनता इनके आचार- व्यवहार से बहुत अच्छी तरह से परिचित है। बड़े साहब से मिलने से पहले आपको बड़े बाबू से मिलना ही पड़ेगा। वह कभी आपको सीधे साहब तक नहीं पहुंँचने देता। रोड़ा बनकर बीच में खड़ा हो जाता है। और साहब भी कभी सीधे कर्मचारियों से ,जनता से मिलना नहीं चाहते । वह भी इन्हीं बाबू का सहारा लेते हैं।
दूसरे शब्दों में कहें तो बाबू मीडिएटर का काम करता है। और आप जानते हैं बिना माध्यम के तो आप कहीं भी नहीं पहुंँच सकते। कोई न कोई सहारा ,कोई न कोई माध्यम तो आपको चाहिए , किसी का तो आपको हाथ पकड़ना ही पड़ेगा, जो आपकी नैया को पार लगा सके।
भगवान से मिलने के लिए पंडित चाहिए, साहब से मिलने के लिए बाबू। दोनों का रेट फिक्स है।"सीधे यदि आप साहब से मिलें तो वह आपकी बात नहीं समझ पाते ;आखिर आपकी बात समझने के लिए बाबू की जरूरत पड़ ही जाती है। इसलिए तो इनकी महिमा का इतना बखान है। और सब से पहले इन्हें चढ़ावा चढ़ाना पड़ता है। इसी महिमा के कारण यह बाबू ,बाबूजी कहे जाते हैं। और बाबूजी कहकर भी आप और हम बेवजह दुहे जाते हैं।
बाबू के दरबार में खाली जेब लेकर जाओगे तो वो तुम्हें पहचानने से इनकार कर देगा। अपना सगा भाई भी भूल जाएगा। मंदिर में प्रसाद चाहिए, ससुराल में मिठाई चाहिए, और बाबू के पास? वहाँ तो "दक्षिणा" चाहिए। फर्क बस इतना है - भगवान प्रसाद से खुश हो जाते हैं, बाबू गांधी जी से।
जैसे महाराजा हर्षवर्धन प्रत्येक पांचवें वर्ष उज्जैन के कुंभ मेले में जाते थे, और अपना सारी धन- संपदा दान कर खाली हाथ ही वापस चले आते थे। वैसे ही यह बाबू हम जैसे निरीह प्राणियों से हर्षवर्धन जैसे त्याग की अपेक्षा पाल लेते हैं। अब हर्षवर्धन जैसी क्षमता भला हम जैसे लोगों में कहांँ?
बाबू का दफ्तर फाइलों से दबा है और बाबू खुद फाइलों के नीचे । फिर भी मुस्कुरा रहा है।लोग समझते हैं बाबू फाइलों के बोझ से दबा गधा है। गलत। बाबू गधा नहीं, सियार है - जो शेर की खाल ओढ़कर बैठा है और शिकार का इंतज़ार कर रहा है।" वह चाहे तो एक झटके में इन फाइलों के गट्ठर को अपनी पीठ से उतर फेंके। लेकिन ऐसा करने में उसका कोई भला नहीं। संबंधित फाइल का ग्राहक जो उसके पास आएगा बार-बार आएगा, आना पड़ेगा, नाक रगड़ेगा और चलते-चलते ऑफिसों के चक्कर काटते-काटते जब उसके पैरों की चप्पल घिस जाएंगे, तब कहीं जाकर उसकी सुनवाई होगी और तब जो चढ़ावा बाबूजी को मिलेगा उसका आनंद ,उसका कहना ही क्या?
यह लोगों की चप्पल घिसने वाली बात भी लोग ऐसे ही नहीं कहते। मुझे तो लगता है बाबूओं का इन चप्पल के बिजनेस वालों से कुछ मिली भगत है। कहीं ऐसा तो नहीं बाबूजी डबल कमीशन कमा रहे हो। यहांँ के तो न्यायालय भी फाइलों के बोझ तले दबे हैं। वहांँ के चक्कर लगाते लगाते भी लोगों के चप्पल तो क्या , जूते भी; वह भी अच्छी ब्रांडेड कंपनी के , उनके तलवे तक निकल जाते हैं । कहीं चप्पलों वालों से वकीलों की भी और जजों की भी मिली भगत तो नहीं। यदि ऐसा है तो यह बिंदु विचारणीय है।
इन बाबूजी की लीला का और क्या बखान करें। ऑफिस से जब साहब रिटायर हुए। और पेंशन आदि बनवाने के लिए जब उन्होंने अपने ही दफ्तर के चक्कर लगाए। तब उन्हें इन बाबूओं की शक्ति का एहसास हुआ। बड़े साहब तो जैसे अर्श से फर्श पर आ गए । जब उनको भी एक सामान्य व्यक्ति की तरह अपने बाबू के सामने कुर्सी पर बैठे रहना पड़ता और घंटो घंटो इंतजार करना पड़ता। तब उन्हें बाबू के रुतबे का कुछ ज्ञान हुआ, जब उनकी फाइल भी अटक गई और काफी समय तक नहीं चली तब उनके मन में खटका हुआ। और वही हुआ जो होना था । फाइलों को गति प्रदान करने के लिए ईंधन की व्यवस्था साहब को भी करनी ही पड़ी। फाइलों के पैर तो होते नहीं, इसलिए बेचारी एक ही स्थान पर पड़े पड़े सड़ती रहती हैं या उन्हें दीमक का निवाला बनना पड़ता है।
जैसे ही फाइलों को चलाने का ईंधन बाबू की जेब में जाता है वैसे ही वर्षों से लटकी फाइल द्रुत गति से अपने गंतव्य तक पहुंँच जाती है।
नेता पांच साल में बदल जाते हैं, सरकारें गिर जाती हैं, पर बाबू नहीं बदलता। क्योंकि लोकतंत्र में जनता सर्वोपरि है, और बाबू जनता से भी ऊपर है। इसीलिए उसे 'बाबूजी' कहते हैं ।