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Trishika Srivastava

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My Articles

दुश्मनों का निशाना हर बार चूक जाता है 'शम्भू' ढाल बन के मेरे आगे आ जाता है - त्रिशिका श्रीवास्तव धरा read more >>
जो ख़ुदा को रखते हैं दिल के हुज़रे में वो परिंदों को क़ैद नहीं करते पिंजरे में - त्रिशिका श्रीवास्तव धरा' कानपुर (उ.प्र) read more >>
अक्सर इक सवाल ज़ेहन को सताता है इक ज़ख़्म भरते ही दूजा क्यों मिल जाता है राहत मिलती है उन के छुने से मुझे चारागरों का कोई इलाज़ काम नह� read more >>
अधर्मियों के कलेजे थरथराते हैं शिवभक्त जब डमरू बजाते हैं ऐ कायरों तुम पीठ पर वार करो हम तो छाती पर त्रिशूल चलाते हैं – त्रिशिका श्� read more >>
अनबोलता के दुःखों का अनुवाद नहीं हुआ कचहरियों में कोई संवाद नहीं हुआ मानव ने जानवर पर अनगिनत जुल्म ढाए मृत्यु पर उनकी विवाद नहीं हु� read more >>
मेरे अंधेरे जीवन में प्रकाश करेंगे 'शम्भू' न मुझे कभी निराश करेंगे मेरे अस्तित्व को जो मिटाने चले हैं 'शम्भू' ही उन का सर्वनाश करेंगे read more >>
मन का हर कोना पुलकित हो जाता है जब आँगन में मेघ रिमझिम मल्हार गाता है यूँ तो इक बरस में बारह महीने होते है लेकिन 'धरा' को केवल सावन का मह� read more >>
सच और झूठ के दरमियाँ, मेरी ज़िंदगी उलझ कर रह गई ताब में उन की ज़ुबाँ भी आज, जाने क्या-क्या मुझ से कह गई — त्रिशिका श्रीवास्तव धरा, कानप� read more >>
मज़हबी ज़हर बोना ही जिसका धंधा है वो कोई पुजारी नहीं, सियासत-दाँ है इनकी ख़ातिर जो झगड़ रहा आपसदारी में सच पूछिये तो साहिब वो अक्ल का अ read more >>
तमाम उम्र तुम्हारी इबादत करुँगी यूँ ही तुम्हारे क़दमों में बैठी रहूँगी तुम मानो मुझे अपना या गैर समझो मैं ख़ुद को तुम्हारी अमानत कहूँ read more >>
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