मन का हर कोना पुलकित हो जाता है
जब आँगन में मेघ रिमझिम मल्हार गाता है
यूँ तो इक बरस में बारह महीने होते है
लेकिन 'धरा' को केवल सावन का मह� read more >>
सच और झूठ के दरमियाँ, मेरी ज़िंदगी उलझ कर रह गई
ताब में उन की ज़ुबाँ भी आज, जाने क्या-क्या मुझ से कह गई
— त्रिशिका श्रीवास्तव धरा, कानप� read more >>