दिल में इस तरह तिरी याद आई
सूने सहरा में गोया बहार आई
कागज़ पे बयां कैसे करूँ ग़म-ए-हिज्र
मिरी कलम में नहीं है इतनी रोशनई
— त्रिशिका श read more >>
ईमान बेच चुके हैं, न जाने किस लाचारी में
खड़े हैं दो-चार, उस मक्कार की तरफ़दारी में
जिधर मिले मुनाफ़ा , उधर ही ढुनक जाते हैं
दो-चार बैंगन ऐस� read more >>
(1). मेरे किरदार पे उसकी ऊगली न उठी होती
गर उसकी भी कोई बहन या बेटी होती
(2). ख़ुद्दारी गवां कर ता'अल्लुक निभाना
मुनासिब नहीं ख़ुद को इतना गि� read more >>
(1). हमारे दरमियाँ दीवार है क्या?
तेरा मेरा मिलना दुश्वार है क्या?
इक-इक साँस मुझे बोझ लगती है,
तू भी मेरे बिना बे-क़रार है क्या?
(2). कितने चे read more >>