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गरीबी ने सारे अरमानों को जला कर राख कर दिया-अपनों के भीड़ से सरेआम बाहर कर दिया
गरीबी ने सारे अरमानों को जला कर राख कर दिया, अपनों के भीड़ से सरेआम बाहर कर दिया। अपने ही समाज ने जिल्लत भरी जिंदगी है दी, जिंदगी की सा�
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विजयदशमी-दशम दिन मां की विदाई से आंखें सबकी नम होती है
आई मां दुर्गा सबके घर नौ दिनों के लिए नौ रूपों में अपना आशीष देने आई मां दुर्गा सबके घर.. करते हैं पूजा सभी भक्तजन अपने-अपने समर्थ अनुसा�
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आज रावण क्यों जलता है-उठता है विश्वास आज रावण जलने पर
आज रावण क्यों जलता है? हुए कई सौ साल मरे रावण को अब से जगह -जगह मर रहा आज भी रावण तब से रावण के संग मिटी बुराई जग की सारी अच्छाई की
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मैं मुसाफिर अपने जीवन का-जो राह है मैने स्वीकारा है
जीवन का जो राह है, मैने स्वीकारा है। जीवन में जो कुछ भी है, मेरा है मुझें प्यारा है। मीठी यादों सा बैहता, दिल में एक झरना सा हैं। मन के �
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चदाँ मामा-के यहाँ चलो न तुम्हे मुझे कुछ दिखलाना है
चदाँ मामा के यहाँ चलो न तुम्हे , मुझे कुछ दिखलाना है। कैसे है मेरे चदाँ मामा कैसे हैं उनके यहाँ के वासी बातें करेंगे उनसे जाने पे उनको
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पुष्प की अभिलाषा-चाह नहीं मैं सुर बाला के गहनों में
चाह नहीं मैं सुर बाला के गहनों में गूँथा जाऊं चाह नहीं प्रेमी माला बन विंध प्यारी को ललचाऊ। चाह नहीं सम्राटों
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पुष्प की अभिलाषा-चाह नहीं मैं सुर बाला के गहनों में
चाह नहीं मैं सुर बाला के गहनों में गूँथा जाऊं चाह नहीं प्रेमी माला बन विंध प्यारी को ललचाऊ। चाह नहीं सम्राटों के शव पर हे हर
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धर्म की अफीम-धर्म तो एक अफीम है राजे यहां तो रोज बजते है बाजे
धर्म तो एक अफीम है राजे यहां तो रोज बजते है बाजे किससे बोलूं गिरी है ऐसी उपर मेरे दुख की गाँजे शुद्र बनाकर मुझको तुमने है रेला खेती ख�
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बहुत दूर चले जाएंगे-तेरी जिंदगी से दर्द और तकलीफ होगी जरूर
बहुत दूर चले जाएंगे तेरी जिंदगी से माना कि दर्द और तकलीफ होगी जरूर पर जाना भी है जरूर सोचा ना था बिन तेरे जीना होगा अश्कों के समंदर म
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हम सबको नित ही मिले-माँ का प्यार दुलार
#विधा:_मुक्तक छंद #"सृजन समीक्षार्थ प्रस्तुत" हमसब को नित ही मिले,माँ का प्यार दुलार। नेक इरादा यदि रहे, जीवन हो गुलजार। लिए धर्म को सा�
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माँ का प्यार दुलार-सदा कायम रहता है
#विधा:_रोला छंद #"सृजन समीक्षार्थ प्रस्तुत" माँ का प्यार दुलार,सदा कायम रहता है। खुद पर हो विश्वास,उसे सबकुछ मिलता है। प्राण समर में या
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सुन ले मेरा अर्ज अब-जीवन कर गुलजार अपनों के साथ है
#विधा:_कुंडलिया छंद #"सृजन समीक्षार्थ प्रस्तुत" सुन ले मेरा अर्ज अब, जीवन कर गुलजार। अपनों के साथ है,माँ का प्यार दुलार।। माँ का प्यार द
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