Nihal singh 03 May 2026 ग़ज़ल प्यार-महोब्बत #हिन्दी ग़ज़ल #दिल #महबूब #दिल्लगी #शायरी #साहित्य लाइव #निहाल सिंह # सवाल #“तहज़ीब में क़ैद” 7235 0 Hindi :: हिंदी
तन्हाई के आलम में साथ रहने की बात करते हो, मैंने कब तुमसे रूह का साथ माँगा था—तुम कमाल करते हो। आओ तुम्हें मिलाऊँ उन चंद लम्हों के हमराह से, ख़ुद-ब-ख़ुद मिल जाएँगे जवाब—जो सवाल करते हो। तेरी बातों में अब वो ठहराव सा नहीं मिलता, लगता है तुम खुद से भी कभी बात नहीं करते हो। तेरे हर फ़ैसले में कोई समझौता झलकता है, मगर तुम उसे भी अपनी ही ख़ुशी करार करते हो। मुझे जिस्म की ज़रूरत आज भी है, कल भी होगी, तुम ही हो जो मुझे हर बार कुछ और समझा करते हो। मोहब्बत को तुमने तहज़ीब से क़ैद में रख ली, जिसे ज़रूरत हो—उसे सबक़ दिया करते हो। ये दौर तुम्हें इस शर्त पे जीने नहीं देगा, तुम जवाँ होकर भी बच्चों सा दिल रखा करते हो। हम टूटते रहे और तुम तमाशा देखते रहे, फिर भी इसे अपना ही फ़ैसला कहते हो। मैंने ख़ामोशियों में भी बहुत कुछ कहा तुमसे, तुम हर बार मुझे समझने से ही इन्कार करते हो। निहाल कहते हैं, जो टूट कर भी संभल जाते हैं, उनके दिल का हिसाब तुम रखते हो।