Anilkumar Rathwa (Sameer) 28 Jan 2026 ग़ज़ल समाजिक “उसूलों की सल्तनत” 8076 1 5 Hindi :: हिंदी
जंगल का राजा भी बन जाता है तमाशा यहाँ, जब अपनी चाल छोड़ दे, दुनिया की भाषा यहाँ। पिंजरे सोने के हों तब भी, घुटती है हर साँस यहाँ, आज़ादी की एक हवा कर देती है तमाशा यहाँ। भीड़ में चलकर लोग खो देते हैं पहचान यहाँ, अपने ही कंधों पर ढोते हैं अपना बोझ यहाँ। जो अपने उसूलों पर चलता, वही बादशाह यहाँ, वरना हर किरदार बस करता है फरियाद यहाँ। ऐ मुसाफ़िर, याद रख ये बाज़ार नहीं तेरा घर यहाँ, तख़्त उसी को मिलता है, जिसमें जिंदा इकरार यहाँ।
4 months ago