Nihal singh 29 Jan 2026 कहानियाँ समाजिक #लघुकथा #हिंदीकहानी #पारिवारिककहानी #सामाजिकयथार्थ #रिश्ते #अकेलापन #माँबेटी #पिता#निहाल 17171 0 Hindi :: हिंदी
आज की सुबह दिनेश के लिए नासूर बनकर उगी थी। वह अब भी अपने बिस्तर पर लेटा था। आँखें खुली थीं, पर उनमें उठने का कोई इरादा नहीं था— मानो रात के दिनेश ने दिन ही समझ लिया हो। बिस्तर पर सलवट तक न थी। दिनेश के लिए आज का दिन मंगलमय हो— ऐसी दुआ करने वाला अब कोई नहीं था। वह उस मकान में रहने वाला अकेला आदमी था। पहले यह मकान नहीं था, घर था। जब तक इसमें उर्मिला की चूड़ियों की खनक और विनीता की हँसी गूँजती थी। अब रसोई में कप वैसे ही उलटे रखे रहते थे। दिनेश ने करवट बदली, घड़ी देखी—साढ़े नौ। किसी ने टोका नहीं। कुछ महीने पहले की बात थी। उस शाम उर्मिला कमरे में बिस्तर पर बैठी विनीता के स्कूल बैग से किताबें निकाल रही थी। एक फ़ॉर्म बार-बार उसकी उँगलियों में आ जाता था। “मैं उसे बोर्डिंग नहीं भेजूँगी,” उर्मिला ने बिना सिर उठाए कहा। दिनेश ने टीवी की आवाज़ बंद कर दी। “मैं भेजूँगा।” उर्मिला ने पहली बार उसे सीधे देखा। “वह अभी बच्ची है।” “बच्ची नहीं रहेगी अगर हम उसे यहाँ ही बाँधे रखें,” दिनेश की आवाज़ सपाट थी। विनीता चुपचाप दरवाज़े के पास खड़ी थी। उसकी चोटी अधखुली थी। “उसे माँ चाहिए,” उर्मिला ने कहा, “नियम नहीं।” दिनेश ने कुछ नहीं कहा। टीवी फिर से चल पड़ा। उस रात पहली बार दोनों के बीच एक अदृश्य दीवार खड़ी हो गई। अगले हफ्तों में बातें कम और फ़ैसले ज़्यादा होने लगे। दिनेश को लगता था कि वह सही कर रहा है। उर्मिला को लगता था कि वह अपनी बेटी को खो रही है। इसी कशमकश में दिनेश का कहा हुआ आदेश बनकर लागू हुआ। विनीता को बोर्डिंग भेजना तय हो गया। स्टेशन पर उस दिन उर्मिला ने विनीता का हाथ देर तक पकड़े रखा। ट्रेन आ चुकी थी। “पापा…” विनीता ने दिनेश की ओर देखा। दिनेश ने सिर हिलाया। शब्द नहीं निकले। ट्रेन चली गई। उर्मिला ने कुछ नहीं कहा। घर लौटकर सीधे अपने मायके चली गई। उसी दिन घर, मकान हो गया। आज दिनेश उठा। रसोई में गया। चूल्हा जलाया— फिर बिना कुछ बनाए बंद कर दिया। दीवार पर लगी विनीता की ड्रॉइंग अब भी टेढ़ी लटकी थी। दिनेश ने उसे देखा, पर सीधा नहीं किया। वह कोई रवायती पति या पिता नहीं था। वह चाहता था कि उसकी बेटी मज़बूत बने। पर यह नहीं समझ पाया कि मज़बूती अकेले नहीं सिखाई जाती। अब वह बदला हुआ आदमी था— जिसे अपने फ़ैसलों का बोझ उठाना आ गया था, पर उन्हें वापस लेना नहीं। शाम ढली। मकान वैसे ही खामोश रहा। दिनेश खिड़की के पास खड़ा रहा— शायद किसी आवाज़ की उम्मीद में, या बस अपने ही फ़ैसलों को सुनने के लिए।