Join Us:
दिशा-लाइव ग्रुप ने लॉन्च किया नया ब्रांड BizPry - लोकल से ग्लोबल तक 20 मई स्पेशल -इंटरनेट पर कविता कहानी और लेख लिखकर पैसे कमाएं - आपके लिए सबसे बढ़िया मौका साहित्य लाइव की वेबसाइट हुई और अधिक बेहतरीन और एडवांस साहित्य लाइव पर किसी भी तकनीकी सहयोग या अन्य समस्याओं के लिए सम्पर्क करें

ख्वाब_के_पार_हक़ीक़त भाग 3

Nihal singh 14 Jan 2026 कहानियाँ समाजिक #ख्वाब_के_पार_हक़ीक़त #हिंदी_कहानी #भावनात्मक_कहानी #छात्र_जीवन #शिक्षा_और_संवेदना #हिंदी_साहित्य #मातृभाषा #दोस्ती #संस्कृति_और_पहचान #युवा_मन #संवेदनशील_लेखन #क्रमशः # निहाल 10919 1 5 Hindi :: हिंदी

ख्वाब के पार : हक़ीक़त  
(भाग – 3)

आज रविवार का दिन था,  
फिर भी आदि आज जल्दी उठ गया।  
उसे स्कूल नहीं जाना था,  
लेकिन वह रोज़ की तरह तैयार हुआ।

नाश्ता करते ही  
वह विकल्प के घर की ओर निकल पड़ा।

आदि की माँ को  
उसके इस व्यवहार में  
कुछ अलग-सा लगा।  
अकसर माँ  
बच्चों की आँखों से ही  
जान जाती हैं—  
कि वे परेशान हैं,  
उत्सुक हैं  
या भीतर ही भीतर दुखी।

माँ ने पूछा—  
“आज तो रविवार है,  
फिर इतनी सुबह नहाकर-धोकर  
कहाँ जा रहे हो?  
क्या कोई बात है  
जो मेरे बेटे को परेशान कर रही है?”

आदि ने सहजता से कहा—  
“कोई खास बात नहीं है, मम्मी।  
मैं विकल्प के घर जा रहा हूँ।  
उसे कुछ विषयों को समझने में  
परेशानी हो रही है,  
उसी ने बुलाया है।”

इतना कहकर  
आदि घर से निकल पड़ा।

---

उधर विकल्प अपने कमरे में  
रखी स्टडी टेबल पर बैठा  
दिनकर जी की ‘रश्मिरथी’ पढ़ रहा था  
और उसकी पंक्तियाँ  
हल्के-हल्के गुनगुना रहा था।

तभी आदि उसके कमरे में आ गया।

आदि मुस्कराकर बोला—  
“अरे! ये क्या,  
यहाँ तो साक्षात  
संगीतकार तानसेन जी हैं।  
मैं तो समझा था  
अपने दोस्त के कमरे में आया हूँ।”

विकल्प हँसते हुए बोला—  
“हाँ श्रीमान,  
आप गलत कक्ष में आ गए हैं।  
यहाँ ‘विकल्प’ नाम का  
कोई शख़्स नहीं रहता।”

दोनों दोस्त  
हँस पड़े।

विकल्प उठकर  
बिस्तर पर बैठ गया  
और आदि को  
अपने पास बैठने को कहा।

आदि बैठा ही था  
कि कुछ पूछने वाला था।

विकल्प ने कहा—  
“अरे भाई,  
इतनी जल्दी आ गए?  
कुछ नाश्ता किया या नहीं?”

आदि बोला—  
“नाश्ता करके आया हूँ।  
और तुम मुझसे  
नाश्ते की चिंता  
कब से करने लगे?

अगर भूखा होता  
तो पहले  
माँ के हाथों का नाश्ता करता।”

विकल्प मुस्कराया—  
“ये तो सही है।  
मम्मी एक दफा  
मुझे नाश्ता देना भूल सकती हैं,  
पर तुम्हें नहीं।”

आदि बोला—  
“हाँ, ये तो है।  
पर अब  
मेरे सवालों के जवाब दे दो,  
ताकि मुझे भी  
थोड़ा सुकून मिले।”

विकल्प बोला—  
“हाँ, पूछो।  
क्या पूछना है?”

आदि कुछ कहने ही वाला था  
कि तभी  
विकल्प की बहन निधि  
कमरे में आ गई।

वह हँसते हुए बोली—  
“अच्छा जी!  
अब जनाब  
सिर्फ़ अपने दोस्त से ही मिलेंगे?  
बहन के लिए  
वक़्त नहीं है?”

आदि मुस्कराकर बोला—  
“भला ऐसा कौन-सा भाई होगा  
जिसे अपनी बहन से मिलने के लिए  
वक़्त निकालना पड़े?

मैं तो पहले  
माँ को प्रणाम करके  
तुमसे मिलने आ रहा था,  
पर माँ ने कहा  
तुम बाहर  
अपनी सहेलियों के साथ गई हो।

तो मैं  
अपने दोस्त के कमरे में आकर  
तुम्हारा इंतज़ार करने लगा।”

विकल्प बोला—  
“आओ, तुम भी बैठो।”

निधि बैठ गई।

विकल्प ने कहा—  
“हाँ आदि,  
अब बताओ,  
क्या पूछना था?”

आदि ने सोचा  
कि शायद विकल्प  
निधि के सामने  
सहज न हो,  
तो उसने  
इशारों में पूछा—

“अगर हिन्दी वाले सर  
ख्वाब की खाई से  
मेरे दोस्त उदय को  
बाहर निकाल पाए,  
तो अंग्रेज़ी वाले सर  
क्यों नहीं निकाल पाए?”

निधि मुस्कराई—  
“बहुत अच्छा तरीका था  
मुझसे बात छुपाने का।  
पर क्या करूँ,  
भैया ने अपना ख्वाब  
मुझे पहले ही बता रखा है।”

विकल्प बोला—  
“अरे यार आदि,  
मैं जितना बताता हूँ,  
तुम उतना ही समझते हो।”

आदि बोला—  
“क्या मतलब?  
अगर हिन्दी में भाव हैं,  
तो अंग्रेज़ी में भी  
तो भाव होते हैं।”

निधि बोली—  
“भाव होते हैं,  
लेकिन वे भाव  
ख्वाब वाली खाई को  
समझ नहीं पाए।”

आदि ने पूछा—  
“इसका क्या मतलब?”

विकल्प बोला—  
“वह खाई  
हमारी संस्कृति की थी,  
हमारी संवेदनाओं की थी,  
हमारे परिवेश की थी।

अंग्रेज़ी  
ज्ञान देती है,  
पर अपनापन नहीं।  
जब अंग्रेज़ी वाले सर ने  
मेरा हाथ पकड़ा,  
तो खाई  
और गहरी होती गई।

लेकिन जब  
हिन्दी वाले सर ने  
कविता गुनगुनाई,  
तो उस खाई को  
अपनापन मिला,  
और वह  
भरने लगी।

मैं  
उसी कविता के सहारे  
बाहर आ गया।”

आदि बोला—  
“अब मैं  
सब समझ गया हूँ।  
लेकिन एक सवाल  
अभी भी बाकी है।”

उसी समय  
माँ ने आवाज़ दी—  
“खाना लग गया है।”

विकल्प बोला—  
“चलो,  
पहले खाना खाते हैं।  
बाक़ी बातें  
कल स्कूल जाते वक़्त  
उदय के साथ करेंगे।”

और फिर  
सब खाना खाने  
चल पड़े।

(क्रमशः)

---
✍️ पाठकों के लिए संवाद / कमेंट प्रॉम्प्ट

👉 क्या आप मानते हैं कि भाषा केवल ज्ञान नहीं, अपनापन भी देती है?  
👉 आपके जीवन में कभी ऐसा हुआ है कि किसी ने सिर्फ़ शब्दों से नहीं, भावों से आपको संभाला हो?  
👉 हिन्दी और अंग्रेज़ी—आपके लिए कौन-सी भाषा ज़्यादा गहराई से जुड़ती है और क्यों?  

अपनी राय ज़रूर लिखें,  
क्योंकि आपकी सोच  
इस कहानी को  
एक नया अर्थ दे सकती है। 🌱

Comments & Reviews

Nihal singh
Nihal singh आप को यह कहानी कैसी लगी जरूर बताए और अगर इस कहानी का अगला भाग चाहते हैं तो #ख्वाब_के_पार_हक़ीक़त भाग 4 लिखे

4 months ago

LikeReply

Post a comment

Login to post a comment!

Related Articles

बहुत समय पहले की बात है रहमान चाचा के यहाँ एक चूहा रहता था. हर दिन की तरह उस दिन भी बाज़ार से गाँव लौटते वक़्त चाचा झोले में कुछ सामान लेकर � read more >>
सच्चे भाई सुबह की योगा क्लास लेने के बाद मैं पार्क से होते हुए बाजार वाली रोड पर सैर के लिए निकल पड़ी । सुबह के व� read more >>
लड़का: शुक्र है भगवान का इस दिन का तो मे कब से इंतजार कर रहा था। लड़की : तो अब मे जाऊ? लड़का : नही बिल्कुल नही। लड़की : क्या तुम मुझस read more >>
Join Us: