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“बराबरी का डर”

Anilkumar Rathwa (Sameer) 22 Nov 2025 कविताएँ समाजिक “बराबरी का डर” 9379 0 Hindi :: हिंदी

बुराई वही करते हैं,
जो बराबरी नहीं कर सकते,
जो खुद की कमी छुपाने को
दूसरों पर उंगली रखते।

जिनके इरादे छोटे हों,
वही दूसरों को छोटा दिखाते,
जो ऊँचाई छू नहीं पाते,
वही राह में पत्थर बिछाते।

सच्चे लोग तो चलते रहते,
अपनी मेहनत की रोशनी में,
झूठे ताने भी हार जाते
हक़ीक़त की सच्ची अग्नि में।

दुनिया की रीत निराली है—
जिसे खुद पर भरोसा नहीं,
वही चुगली, वही जलन,
वही नफरत बोता कहीं।

इसलिए चलो आगे बढ़ें,
अपनी पहचान बना कर,
क्योंकि रोशनी का कोई क्या बिगाड़े—
अंधेरा तो खुद ही मिट जाता है झुककर।

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