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ग़ुर्बत का जनाज़ा

Nihal singh 29 May 2026 कविताएँ समाजिक 956 0 Hindi :: हिंदी

वो रात —
जो भूखे बच्चों की आँखों में ठहरती है,
किसी मुर्दे की तरह हर साँस पे बिखरती है,
जहाँ माँ अपनी ही भूख को दुआ कहती है,
और रोटी —
कफ़न ओढ़े हुए चौखट पे उतरती है।

वहाँ चूल्हे की राख भी
सिसक-सिसक के रोती है,
हर इक आह क़र्ज़ की
ज़ंजीरों में ही सोती है,
फ़क़त धुआँ ही धुआँ है,
न कोई रौशनी होती है,
ग़ुर्बत इंसाँ के जिस्म में
धीरे-धीरे मौत बोती है।

वो बच्चा —
जिसकी पसलियाँ भी अब उभर के बोलती हैं,
जिसकी ख़ामोश निगाहें रात भर कुछ टटोलती हैं,
वो नींद में भी रोटियों के ख़्वाब घोलती हैं,
मगर सुबह —
उसकी हथेलियाँ बस कूड़े से ही खेलती हैं।

यहाँ बारिश भी होती है
तो छप्परों पे क़हर बनकर,
हवा भी चलती है तो आती है
किसी ख़ूँख़ार ज़हर बनकर,
हर इक मौसम उतरता है
ग़रीबों पर कहर बनकर,
यहाँ सूरज भी जलता है
फ़क़त नंगी तलवार बनकर।

कभी देखा है वो मंज़र —
जहाँ माँ अपने बच्चे को सुलाती है,
मगर ख़ुद भूख की हैवान आँखों से डर जाती है,
जहाँ ख़ामोश रोटी भी तवे पर चीख़ जाती है,
और खाली देगची
दीवारों से सिर टकराती है।

ये ग़ुर्बत —
कोई लफ़्ज़ नहीं, इक ख़ूँ-चूस साया है,
जो हर मुफ़्लिस की रग-रग में उतर आया है,
ये ऐसा ज़ख़्म है जो वक़्त से भी भर न पाया है,
यहाँ हर ज़िंदा इंसाँ भी
चलती हुई इक मय्यत का साया है।

मगर अहल-ए-ज़र के शहर में
सब कुछ बड़ा दिलकश मिला,
किसी के जाम चमकते हैं,
किसी का ख़ून दलदल मिला,
वो कहते हैं — “ये क़िस्मत है…”
मगर हर फ़ैसला संदल मिला,
“निहाल” इस दौर-ए-ग़ुर्बत में
बस मौत का जंगल मिला।

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