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गुनगुना रहा

Rupesh Singh Lostom 03 May 2023 कविताएँ अन्य गुनगुना रहा 35283 0 Hindi :: हिंदी

वक़्त के मासूम ग़जल 
गुनगुना रहा तो कुछ 
चुपके चुपके गा रहा 
सोर में दवा दवा 
कोयल की बोलियां 
 मन मोह रहा
समय के अटल हिदायत 
इंसान ही बस तोड़ रहा 
बाकि तो निर्दोष ही 
काल के वली चढ़ रहा 
दोष सारा आशमा का 
जो बन कहर वरष रहा 
पर्वते तो उ ही 
बे वजह बदनाम हैं

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