Anilkumar Rathwa (Sameer) 15 Aug 2025 कविताएँ समाजिक जाति का ज़हर 13306 0 Hindi :: हिंदी
आज के युग में लोग जाति के नाम पर लड़ रहे हैं, पर उन्हें क्या खबर… कि वे अपने ही समाज से दूर हो रहे हैं। भाई-चारे की डोर अब नफरत से टूट रही है, मानवता की किताब धूल में कहीं छूट रही है। जिनके पूर्वजों ने एकता की मशाल जलाई थी, आज वही वंशज दिवालों में सीमित हो रहे हैं। रंग-धर्म, ऊँच-नीच के बंधन कैसे रिश्तों को तोड़ रहे हैं, एक ही धरती के वासी अजनबी से हो रहे हैं। सच तो यह है कि— जाति का अहंकार मनुष्य को छोटा कर रहा है, और प्रेम की कमी समाज को बिखेर रही है। आओ छोड़ दें ये दीवारें, एक नया संदेश जगाएँ, मानवता के नाम पर सबको गले लगाएँ।