Kishor Kumar Bhardwaj 13 Oct 2025 कविताएँ हास्य-व्यंग व्यंग्य 14182 0 Hindi :: हिंदी
" जुगनुओं ने शराब पी ली है.." (✍️तीखा व्यंग्य - के. भारद्वाज) जुगनुओं ने शराब पी ली है, अब ये सूरज को गाली देंगे, दो घूंट सत्ता की, तीन झूठ ताली के, अब खुद को ‘प्रकाश पुरुष’ कहेंगे। कल तक अंधेरे की जेब में थे, आज मंच पर माइक थामे हैं, हर टिमटिम में घोषणा होती है - “हम ही दिशा, बाकी सब थामे हैं!” सूरज पर केस करेंगे शायद, कहेंगे - “ये बहुत चमकता है!” और खुद अंधेरे में बैठकर ट्वीट करेंगे - “हमसे बड़ा रोशन कोई नहीं रहता है।” रात की रजाई में सेंध लगाकर, उन्होंने चाँद से ठेका ले लिया है, अब जुगनू प्रेस कॉन्फ़्रेंस बुलाते हैं - “उजाला हमारी नीतियों से हो गया है।” कितना मज़ेदार है ये नाटक, जहाँ झिलमिल अहंकार में जलते हैं, और जनता - बेचारे पतंगे बनकर, इनकी झूठी रोशनी में जलते हैं। सूरज अब भी चुपचाप उगता है, ना नाराज़, ना नारों में शामिल, क्योंकि उसे पता है - हर नशे की सुबह होती है, और हर जुगनू का अंत… अंधकार में शामिल।