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Kishor Kumar Bhardwaj
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Kishor Kumar Bhardwaj
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, Chhattisgarh
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स्मृतियाँ
कभी किसी ने कहा था — “समय-समय की बात है…” पर शायद समय भी अकेला कहाँ चलता है, वह तो कारणों की अनदेखी धारा में अपना स्वरूप पाता है। एक नि�
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हौसले
थक गया हूँ सफ़र में मगर रुकना नहीं सीखा, इन बुझते हुए ख़्वाबों को फिर से मचलने दो। रात ने छीन ली है चमक मेरी निगाहों की, सुबह बनकर उभरूँ�
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वसंत का यौवन
अंग अंग भरी जवानी मन ही मन इठलाता यौवन मादकता के रंग बिखेरे मदमाता बल खाता यौवन बहती सरिता सी अंगड़ाई फूलों सा महकता यौवन उन्मुक्त उ
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विरह वसंत
रोती फिरती राधिका अजहु श्याम ना आए। विरह अगन में तप रही मोहे ऋतुराज ना भाये।। पीत वर्ण काया भयी कंचन के रंग सी। आंखों में है लालिमा ज�
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वसंत
स्वर्णिम धूप, हरा मैदान पीली सरसों हुई जवान चुस्त हुआ, रंगों में नहा लो देखो वयस्क हुआ उद्यान झील में हैं कुछ श्वेत कमल या बादल नभ पर �
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ये पत्तों की टहनियों से
#पतझड़ ये पत्तों की टहनियों से जुदा होने का मौसम है। तन्हा छोड़ उन्हें हवाओं में बह जाने का मौसम है। ये पतझड़ है। गम की नम आंखों से झांकत
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खामोश मंजिल
#खामोश_मंजिल ऊँचाई पर पहुँचकर शायद हवा पतली हो जाती है, साँसें चलती हैं पर अपनापन कम हो जाता है। नीचे भीड़ थी, शोर था, पर अपनो की एक आवा�
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रास्तों के कांटे
“रास्तों के कांटे” रस्तों में कांटे बिखरे हों, तब भी पैर बढ़ाना है, लेकिन कांटे ही बिखरे हों - तो बेहतर हट जाना है। इतना भी क्या आशावाद
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जब ‘मैं’ से ‘हम’ का योग हुआ
#योग_हुआ वो दिन था जैसे सहर नई, मन में उजला संयोग हुआ। सदियों का तप थम गया वहीं — जब नयन मिला, योग हुआ। तेरी हँसी, मौन का कोई राग बनी, जो �
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मेरा सफ़र अलग है, मुझे जाने दीजिए।
मुझको न रोकिए, न सलाहें दीजिए, मेरा सफ़र अलग है, मुझे जाने दीजिए। हार भी मिले अगर, तो मुस्कराने दीजिए, क़िस्मत को हमें अपनी आज़माने दीज�
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