Radheshyam Joshi 27 Dec 2025 कविताएँ समाजिक 17692 1 5 Hindi :: हिंदी
यही तो गुमान है मुझे कि, मैं सबका पेट पालता हूं। मगर खुद का नहीं, क्योंकि मैं किसान हूं। घूटन में पलता, कर्ज से मरता, भूखा और लाचार। हर सुविधा से वंचित, मेरा परिवार। मैं फसल का मालिक, खून पसीने से सींचता। फिर उसे मंडी में जा, कोडी के भाव बेचता। घर का राशन लाना है, बेटी की शादी करनी है, मैं इंतजार नहीं कर सकता, बाजार की मांग का। लेकिन टूट जाता हूँ मैं, जब दो रुपये किलो का प्याज सौ रुपये किलो में लाता हूं। पचास रुपये किलो का चना, सौ रुपये किलो की दाल में पाता हूँ। मेरी दरकार के आगे, सरकार भी कुछ नहीं करती। छोटी सी मुआवजे की मरहम, मेरे परिवार का पेट भी नहीं भरती। - राधेश्याम जोशी कोहिणा
5 months ago