Santosh kumar koli ' अकेला' 14 Dec 2025 कविताएँ समाजिक क़लम का कावा 6514 0 Hindi :: हिंदी
तलवार से तीव्र, क़लम की धार। सह्य करवाल की, असह्य क़लम की मार। अंत में क़लम के, नीचे आती तलवार। क़लम की मार से, क़लम ही सकती उभार। क़लम सिर कलम करती नहीं, देती फेर। क़लम फेरा अनंत, अनंतक, हंता शमशेर। क़लम बैठी ताकती, काल क्रम मुंडेर। अमिट कर्म लेख, जो ईश ने दिया उकेर। क़लम है कमल, कपिला, क्रांति, क़ातिल। क़लम कसक न मिटे, मरता तिल- तिल। क़लम तेज को मिटा न सके, अनल, अनिल। है अशक्त है सशक्त, जंग, रंग मेज के कायल।