Kishor Kumar Bhardwaj 03 Mar 2025 कविताएँ समाजिक 16478 0 Hindi :: हिंदी
रे मनुष्य हो सावधान! वन्य जीवों का करो सम्मान !! मानवता हेतु शर्म की घड़ी है प्रश्नों संग पशु दुनिया खड़ी है काट डाले आश्रय वन सारे निराश्रय फिरते पशु मारे मारे निरीहों का बन निर्मम हंता प्रकृति का, स्वयंभू नियंता चिथड़े किए पृथ्वी परिधान ।। रे मनुष्य हो सावधान! वन्य जीवों का करो सम्मान !! अतिक्रमण रही मानवी नियत कब्जा करना इंसा फितरत उन्मादी भौतिकवादी सम्मोहन भू,जल,वृक्ष का अंध दोहन हिंसा नहीं सिर्फ पशु निशानी निरिह बलि पुरातन कहानी इंसानियत कैसे पशुता से महान। रे मनुष्य हो सावधान! वन्य जीवों का करो सम्मान !! मानवता की बदली परिभाषाएँ करता पशु शोषण व हत्याएँ दया,शांति,अहिंसा पशु लक्षण मानव करता खुद का भक्षण बारम्बार प्रकृति देती सीख मानव को नहीं रहा दीख नित तोड़े जाते प्रकृति विधान।। रे मनुष्य हो सावधान! वन्य जीवों का करो सम्मान !! नहीं बंद हुए गर , छेड़छाड़ आयेंगे वायरस,अकाल,बाढ़ अनल बन जायेगा, अनिल फूल, पर्ण नहीं पायेंगे खिल भू, प्रकृति न देंगी निवाले तुम्हें भोजन के होंगे लाले बेजुबानों का करो सम्मान ।। रे मनुष्य हो सावधान! वन्य जीवों का करो सम्मान !!