Kishor Kumar Bhardwaj 03 Mar 2025 कविताएँ अन्य 19131 0 Hindi :: हिंदी
टहनियों के बीच से झांकता परिंदा, बाहर के माहौल को भांपता परिंदा, घोसले के मोह से न जागता परिंदा, पर भूख के पीछे भीतर भागता परिंदा। ज्यादातर लोग बस इसी परिंदे की नकल होते है, डर और प्रेरणा के बीच ऐसे ही मगन होते है, आगे बढ़ने और रुकने के बीच दफन होते हैं, जिंदगी के मीठे फल से बेदखल होते है। लाख चाहकर भी लोग नही तोड़ पाते है ये कड़ियाँ, जैसे बिना बांध के ही बंध जाती हो नदियां, मानों तूफान में भी ऊर्जाहीन पड़ी हो बिजलियाँ, या टूटे कोकून से न निकल पायीं तितलियां। जिंदगी का रहस्य नही पता कैसा है? मानों बीज में पेड़ या पेड़ में बीज बैठा है, हर विरोधाभास जैसे एक दूसरे में ऐंठा है, कौन जाने इस जिंदगी का रूप ही कुछ ऐसा है?