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“धरती आबा बिरसा”

Anilkumar Rathwa (Sameer) 28 Nov 2025 कविताएँ देश-प्रेम “धरती आबा बिरसा” 11239 0 Hindi :: हिंदी

जंगल की पगडंडी पर,
एक दूब-सा कोमल बालक,
सूखे पत्तों की सरसराहट में
सपनों का गूंथता था मालक।

मगर सपने उसके छोटे न थे,
ना डराए उसे कोई तूफ़ान;
उसकी आँखों में बसता था—
अपने लोगों का स्वाभिमान।

बिरसा खड़ा था सीना तानकर,
जंगल-पहाड़ों की ढाल लिए,
अन्याय की हर दीवारों पर
साहस का हथियार लिए।

उसने कहा—
“अबुआ डिसुम, अबुआ राज,
हमरा जमीन, हमरा समाज।”
ये सिर्फ नारा नहीं था,
एक पूरी पीढ़ी की आवाज़।

आदिवासी जो सोए थे,
उनमें चिंगारी जगा दी उसने,
महाजनों की बेड़ियों को
मुट्ठी में तोड़ दिखा दी उसने।

धरती, पानी, जंगल—
यह सिर्फ संसाधन नहीं, पहचान है;
इस पर हक है उन्हीं का
जिनकी ये सदियों से शान है।

सिर्फ पच्चीस की उम्र में ही
इतिहास नया रच गया वो,
अपनी शहादत की ज्वाला से
भय का अंधेरा हर गया वो।

आज भी उसकी पुकार
हवा में गूंजती है,
हर संघर्षशील दिल में
नया जोश भरती है।

बिरसा कहता है—
“अन्याय मिले तो आवाज उठाओ,
सच की राह से कभी न हटो,
जंगल हो या शहर की राह,
खुद की जमीन पर दृढ़ता से डट हो!”

धरती आबा की यह कहानी
सिर्फ बीता कल नहीं,
हर युवा के हृदय में
फिर से जगने वाली जल नहीं।

उठो, फिर से उलगुलान करो,
अपने अधिकारों की शान करो,
जो छीनने आए हक तुम्हारा—
उनके सामने पर्वत-सी जान करो!

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