Anilkumar Rathwa (Sameer) 12 Oct 2025 कविताएँ समाजिक धैर्य की कीमत 14394 0 Hindi :: हिंदी
आज के युग का अजब नज़ारा, सबको मंज़िल चाहिए दोपहरा। ना ठहराव, ना कोई सब्र अब, हर दिल में बस जल्दी का सहरा। कदम-कदम पर जो ठोकर खाए, वो हार समझ कर पीछे हट जाए। पर जो गिरकर फिर मुस्कुराए, वो ही जीवन का अर्थ समझ पाए। धैर्य वो दीपक है अंधियारे में, जो जलता रहे हर हारे में। जिसने इस दीप को बुझा दिया, उसने जीवन का स्वाद गँवा दिया। सफलता कोई खेल नहीं, ये तो तप की राह है। जहाँ हर कदम पर परीक्षा है, और हर सांस में चाह है। फल मीठा तब ही होता है, जब पेड़ ने धूप सही होती है। और मंज़िल उसी को मिलती है, जिसने मुश्किलें सही होती हैं। आज के युवा, सुनो ये बात, धैर्य ही तुम्हारी असली जात। जो समय को समझ कर चलता, वही जग में उजाला करता। जल्दबाज़ी में जो दौड़ेगा, वो खुद को ही खो देगा। पर जो हर पल को जीता जाएगा, वो इतिहास में नाम लिखाएगा।