Rambriksh Bahadurpuri 07 May 2026 कविताएँ समाजिक #Rambriksh bahadurpuri #utho dhara ko chhod gagan ko chhu lo tum 4932 1 5 Hindi :: हिंदी
उठो धरा को छोड़ गगन को छू लो तुम, उठो धरा को छोड़ गगन को छू लो तुम तुम्हीं एक हो वीर इसे न भूलो तुम किस्मत भी आती है हिस्से में उनके तकदीर स्वयं गढ़ने की हिम्मत हो जिनके मन मारे मत बैठो खुद को तोलो तुम उठो धरा को छोड़ गगन को छू लो तुम, खाने वाले तो भीख मांग कर भी खाते हैं पर क्या सोहरत के सीढ़ी पर चढ़ पाते हैं? अगर नहीं तो बंद पटल को खोलो तुम उठो धरा को छोड़ गगन को छू लो तुम, ऊंचे-ऊंचे देख शिखर सिर झुक जाने से क्या हुए विफल हम जीवन में मंजिल पाने से ? अगर नहीं तो खेल और कुछ खेलों तुम उठो धरा को छोड़ गगन को छू लो तुम, जीवन है संघर्ष सोंच लो अपने मन में रच दो एक इतिहास स्वयं का इस जीवन में चुप मारे मत बैठो खुल कर बोलो तुम उठो धरा को छोड़ गगन को छू लो तुम, हर मुश्किल का भी अपना एक हल होता है संघर्षों का निश्चित ही एक कल होता है अगर नहीं तो किंतु परन्तु में झूलों तुम उठो धरा को छोड़ गगन को छू लो तुम, बैठ हाथ पर हाथ धरे या पछताने से मिला किसे है स्वर्ग पूर्व ही मर जाने से अभी समय है,बंद नेत्र को खोलो तुम उठो धरा को छोड़ गगन को छू लो तुम, कंकड़-पत्थर तूफानें भी पर पर तेरे खड़े मिलेंगे जगह जगह ही तुझको घेरे संघर्षों से लड़ कर जीवन जी लो तुम उठो धरा को छोड़ गगन को छू लो तुम, लची लेखनी आज तुम्हें ही समझाने को कहें बहादुरपुरी आज कुछ कर जाने को खुद पर कर विश्वास,भ्रम को छोड़ो तुम उठो धरा को छोड़ गगन को छू लो तुम, रामवृक्ष बहादुरपुरी अम्बेडकरनगर उत्तर प्रदेश
3 weeks ago
I am Rambriksh Bahadurpuri,from Ambedkar Nagar UP I am a teacher I like to write poem and I wrote ma...