Avnish Dutt 21 Apr 2026 कविताएँ समाजिक papa k upar kavita, papa k liye kavita, poem for papa, poem for dad, poem for father, papa aur bete ka rishta, papa aur bete ka pyar, bete ka papa k liye aabhaar, poem for Father's Day 13965 0 Hindi :: हिंदी
मेरी दौलत—पापा की बदौलत मेरे पापा कभी सख़्त हो जाते हैं, कभी सरल हो जाते हैं, मैं इस बात से हैरान हूँ, वक़्त के साथ-साथ कैसे वो हर वक़्त हो जाते हैं। धुंधली-धुंधली सी याद है मुझे, जब माँ के दुलार से भी मेरी किलकारी नहीं जाती थी, और पापा की बहां सिरहाने लगते ही मुझे नींद आ जाती थी। जब मैं किसी बच्चे के हाथ में कोई खिलौना देखा करता था, “काश ये मेरा होता” यह कह सोया करता था, उस काश को हकीकत में बदलने की मैंने पापा में ताकत देखी है, अपनी रोटी की गिनती कम कर के, मैंने बेजुबां खिलौनों की तादाद बढ़ते देखी है। हालातों से लड़ने का हुनर भी उनमें खूब है, जब मैं देखता हूँ, मेरे दो जोड़ी जूतों के खातिर, उनकी चार रंगों की बुरसेटों के लिए एक पतलून भी बहुत है। मेरा अच्छे स्कूल में दाखिला हो जाए, उन्होंने बहुत पापड़ बेले हैं, गर्मियों की सारी धूप अपने सर पर झेले हैं, दफ़्तर से छुट्टी ले-लेकर हर स्कूल के दरवाज़े खोले हैं। जिसे वो देखना भी गवारा नहीं समझते थे, मेरी सिफ़ारिश के लिए उनके आगे हाथ जोड़े हैं। मेरे पापा कभी सख़्त हो जाते हैं, कभी सरल हो जाते हैं, मैं इस बात से हैरान हूँ, वक़्त के साथ-साथ कैसे वो हर वक़्त हो जाते हैं। वो पापा ही हो सकते हैं, जो दफ़्तर में भले ही देर हो, पर मुझे स्कूल समय पर छोड़ा करते थे, कहीं मेरे अनुशासन में कमी न आ जाए, रोज़ अपने चरित्र को थोड़ा-थोड़ा मोड़ा करते थे। पढ़ाई के मामले में भी वो कोई रियायत नहीं बरतते थे, हर इम्तिहान की सुबह से पहले वो, रात-रात को जगा-जगा कर पढ़ाया करते थे। जब भी मैं नींद की झपकी लेता, वो सिर्फ एक वाक्य दोहराया करते थे, “आज क़तल की रात है बेटा” और पढ़ाया करते थे। पूरे साल कक्षा में क्या समझ आता, जो उस अकेली रात में निचोड़ आता, बस मैं यूँ ही अगले पायदान पर चढ़ जाता। मेरे पापा कभी सख़्त हो जाते हैं, कभी सरल हो जाते हैं, मैं इस बात से हैरान हूँ, वक़्त के साथ-साथ कैसे वो हर वक़्त हो जाते हैं। ख्वाहिश हमारे हर दौर की पूरी हुई है पापा, दीवाली के पटाखों से लेकर होली के रंगों में न कोई दूरी हुई है। आज एहसास हुआ, जब आपकी पदवी पाकर मेरा नया अवतार हुआ, मेरे सपने भी जस के तस आपके वंश के लिए, जहाँ खड़ा हूँ वहाँ से भी कुछ कर जाऊँ, यही मेरी आज़माइश होगी, क्या मैं भी आपसे उसी सिद्दत से प्यार करता हूँ, और वक़्त के साथ-साथ क्या मैं भी चलता हूँ।