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व्यंगात्मक लेख

डॉ राजेंद्र यादव आजाद 01 Jan 2026 आलेख अन्य व्यंगात्मक लेख 8618 0 Hindi :: हिंदी

बंशीधर की समाज सेवा 
समाज कभी-कभी  लोगों को बहुत देर से  याद आता है। कई लोगों के जीवन में वह तब याद आता है जब  वह कुर्सी से उतर जाता है यानि सरकारी नौकरी से सेवानिवृत हो जाते हैं! बंशीधर के साथ भी यही हुआ। पूरी ज़िंदगी सरकारी नौकरी में रहे, फाइलों के बीच जिए, आदेशों की छाया में साँस ली, लेकिन समाज उन्हें कभी दिखाई नहीं दिया। तब समाज एक शब्द था—योजना के नाम में, प्रस्ताव की पंक्ति में, या भाषण के आख़िरी पैरा में। समाज तब कोई जीवित इकाई नहीं था, बल्कि एक औपचारिकता था जिसे निपटाया जा सकता था, टाल दिया जा सकता था, या नियमों के बाहर बताकर चुप करा दिया जा सकता था।
नौकरी के दिनों में जब स्कूल की छत टपकती थी, अस्पताल में दवा नहीं होती थी, गाँव की बस्ती में पानी नहीं आता था, तब बंशीधर के भीतर कोई सामाजिक पीड़ा नहीं उठती थी। तब वे निरीक्षण करते थे, टिप्पणी लिखते थे, समिति बनाते थे। अन्याय को वे “प्रक्रियागत बाधा” कहते थे और पीड़ा को “तकनीकी कारण”। समाज तब उनकी आँखों के सामने था, लेकिन दिखाई नहीं देता था, क्योंकि देखने के लिए संवेदना चाहिए होती है और बंशीधर के पास सिर्फ़ अधिकार था।
फिर एक दिन वह कुर्सी चली गई। आख़िरी हाज़िरी लगी। पेंशन का पहला संदेश मोबाइल पर आया। और उसी क्षण बंशीधर के भीतर समाज का जन्म हुआ। अचानक उन्हें सब कुछ दिखने लगा—बेरोज़गारी, संस्कारों का पतन, युवाओं की भटकन, ग्रामीण जीवन का संकट। यह सब उन्हें तब नहीं दिखा था जब वे व्यवस्था का हिस्सा थे। यह सब तब दिखा जब व्यवस्था ने उन्हें रिटायर कर दिया।
अब बंशीधर समाजसेवी थे। अब वे चौपालों पर दिखने लगे, मंचों पर बोलने लगे, गोष्ठियों में आमंत्रित होने लगे। उनकी आवाज़ में चिंता थी, माथे पर शिकन थी, और शब्दों में नैतिकता का भारी बोझ। अब समाज की छोटी-छोटी बातें उन्हें बहुत बड़ी लगने लगीं। कोई युवक सवाल पूछ ले तो समाज दिशाहीन हो जाता। कोई लड़की अपने जीवन का निर्णय खुद ले ले तो संस्कृति संकट में आ जाती। कोई गरीब नियम तोड़ दे तो नैतिकता खतरे में पड़ जाती। लेकिन अजीब बात यह थी कि उन्हें कभी यह नहीं दिखा कि व्यवस्था ने क्या किया, सत्ता ने क्या किया, और उन्होंने स्वयं क्या नहीं किया।
अब बंशीधर हर जगह थे—व्हाट्सऐप समूहों में, सभाओं में, मंचों पर। वे कहते थे कि उन्हें राजनीति में कोई रुचि नहीं है, वे तो बस समाज के लिए कुछ करना चाहते हैं। समाज मुस्कुरा देता था, क्योंकि समाज जानता है कि राजनीति में वही लोग आते हैं जो पहले इनकार करते हैं। समाजसेवा उनके लिए सेवा नहीं थी, वह एक सीढ़ी थी—ऐसी सीढ़ी जिस पर चढ़कर वे फिर से राजा बन सकें, इस बार जनता के नाम पर।
और यहीं से बंशीधर का सबसे बड़ा विरोधाभास शुरू होता है। उनके अपने बच्चे विदेश में पढ़ रहे थे। विदेश में बस चुके थे। अंतरजातीय विवाह करके “सेटल” हो चुके हैं। अंग्रेज़ी में सोचते थे, विदेशी मुद्रा में कमाते थे, और आधुनिक जीवन को जी रहे थे। यह सब बंशीधर के लिए गर्व की बात थी। वे दोस्तों को बताते थे—मेरा बेटा अमेरिका में है, मेरी बेटी यूरोप में है। यह उपलब्धि थी, सफलता थी, प्रगति थी।
लेकिन उसी बंशीधर की ज़ुबान गाँव में कुछ और बोलती थी। वही बंशीधर चौपाल पर खड़े होकर ग्रामीणों को समझाते थे कि बच्चों को गाँव से जोड़ो, गाँव छोड़ना पतन है, संस्कार मत छोड़ो, अपनी जड़ों से जुड़े रहो। गाँव चुपचाप सुनता था। कोई पूछता नहीं था कि आपके बच्चे क्यों नहीं जुड़े। क्योंकि यह सवाल पूछना असंस्कारिक माना जाता था।
बंशीधर के यहाँ संस्कार भी दो तरह के थे। अपने बच्चों के लिए आधुनिकता, दूसरों के बच्चों के लिए परंपरा। उनके बेटे ने विदेश में शादी की तो वह उदार सोच कहलाया। गाँव के लड़के ने दूसरी जाति में शादी की तो वह संस्कृति पर हमला बन गया। उनकी बेटी ने विदेश में स्वतंत्र जीवन जिया तो वह निजी स्वतंत्रता थी। गाँव की लड़की ने सवाल किया तो वह मर्यादा का उल्लंघन था। नैतिकता उनके यहाँ एक वीआईपी पास थी—जो सबके लिए नहीं था।
वे कहते थे कि आज का युवा गाँव छोड़ रहा है, यही सबसे बड़ी समस्या है। लेकिन कोई यह नहीं पूछता था कि आपके बच्चे क्यों नहीं रुके। क्योंकि बंशीधर के सवालों का जवाब देना उनका काम था, समाज का नहीं। वे कहते थे कि संघर्ष जीवन को मजबूत बनाता है, लेकिन उनके बच्चे संघर्ष से दूर, सुविधा के सबसे नज़दीक थे। गाँव में टूटी सड़कें थीं, बंद स्कूल थे, खाली अस्पताल थे, और बंशीधर कहते थे कि गाँव में रहकर भी सब किया जा सकता है। लेकिन उन्होंने अपने बच्चों को यह प्रयोग करने नहीं दिया।
जैसे-जैसे चुनाव नज़दीक आते गए, बंशीधर का समाज प्रेम और गाढ़ा होता गया। भाषण तीखे हो गए, मंच बड़े हो गए, समर्थक अचानक पैदा होने लगे। अब वे कहते थे कि अगर समाज चाहेगा तो वे पीछे नहीं हटेंगे। समाज समझ गया कि यह निवेदन नहीं, घोषणा है।
एक दिन चौपाल में एक बूढ़े किसान ने साहस करके पूछ लिया कि आपके बच्चे गाँव क्यों नहीं रहते। बंशीधर मुस्कुराए—वही राजनीतिक मुस्कान—और बोले कि समय बदल गया है। किसान ने सीधा सवाल किया कि फिर हमें क्यों रोकते हो। सन्नाटा छा गया। क्योंकि यह सवाल बहुत ईमानदार था।
बंशीधर कोई एक व्यक्ति नहीं है। वह एक प्रवृत्ति है। वह उस वर्ग का प्रतिनिधि है जो कुर्सी पर रहते समाज भूल जाता है और कुर्सी जाते समाज ओढ़ लेता है। जो अपने बच्चों के लिए भविष्य चुनता है और दूसरों के बच्चों के लिए संस्कार। जो घर में आधुनिक होता है और समाज में नैतिक ठेकेदार। समाज को ऐसे बंशीधर से न डरना चाहिए, न प्रभावित होना चाहिए। बस इतना याद रखना चाहिए कि जिसने अपने बच्चों को गाँव में भविष्य नहीं दिया, उसे गाँव को भविष्य सिखाने का नैतिक अधिकार नहीं  है!! डॉ राजेंद्र यादव आजाद दौसा राजस्थान मोबाइल 94 1427 1288

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