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"गिरकर संभलने का हुनर"

Anilkumar Rathwa (Sameer) 06 Feb 2026 कविताएँ समाजिक "गिरकर संभलने का हुनर" 4661 0 Hindi :: हिंदी

राहों में कांटे होंगे ही, पैरों में छाले आएंगे,
मंजिल की धुन में राही, कई बार डगमगाएंगे।
गिरना कोई हार नहीं, ये तो बस इक विराम है,
जो गिरकर फिर से उठ खड़ा, असली वही इंसान है।

​ठोकर ही तो सिखाती है, कि कदम कैसे बढ़ाना है,
हवाओं के विपरीत जाकर, अपना दीया जलाना है।
चोट खाकर जो बिखरा नहीं, वो फौलाद बन जाता है,
जो गिरकर संभल जाता है, वो अक्सर जिंदगी समझ जाता है।

​धुंधली होगी राह कभी, और अंधेरा भी गहरा होगा,
पर याद रख, तेरी मेहनत पर ही कामयाबी का सेहरा होगा।
दुनिया उसे ही सलाम करती, जिसने लड़ना सीखा है,
बिन गिरे जो चलता रहा, उसका तजुर्बा थोड़ा फीका है।

​तो उठ मुसाफिर, धूल झाड़, फिर एक नई शुरुआत कर,
अपनी हिम्मत, अपने हौसले से, तू खुद से ही बात कर।
जीत उसी की तय है यहाँ, जो हार से नहीं घबराता है,
क्योंकि संभलने वाला ही अंत में, 'सिकंदर' कहलाता है।

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