खामोश थे ,शब्द उसके
छाई थी! उदासी ,सी
पास बैठ थे!
हम भी,
पर उसे ,पता नहीं !
ये क्या कोई दर्द था ,
या दिल्लगी
तब से हम भी,
ये ही सोच रहे है! read more >>
बचपन आज यह सोच रहा
कहाँ खो गया आज वो
खुद अपने को खोज रहा
बस्तो के नीचे दबा हुआ
सोने के समय जगा हुआ
भाग दौड़ के इस समय में
वो समय के पीछे खो read more >>
सत्ता... (कविता )
1.कागज छुती न कलम उठाती,है इसे कुर्सी पर बैठे रहने की बिमारी,
2.हां...है अंधी ,गूंगी, बहरी और लंगङी,है इसे गाङी पर बैठे रहन� read more >>
(कविता) बेरोजगार की आवाज ....
गांव गली शहरो मे चर्चे आम हो जाए,
सत्ता धारी द्वार खोले तो हम तेरे हो जाए,
तुम्ही हो भाषण, तुम्ही हो ताली,
त� read more >>
कविता (यार मेरे ...)
किस दौङ मे लग गए ना जाने दिनरात मेरे,
अपनी चाहत को दुनिया की नजर खा गयी सारी,
किस ख्वाब मे सिमट कर रह गए सुबह-शाम मेरे... read more >>