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आ लौट चली आ घर अपने-है कद्र नही जिस नारी को पति के सारे अरमानों की
आ लौट चली आ घर अपने है कद्र नही जिस नारी को,पति के सारे अरमानों की वह हो ना सकती है नारी,बस सिवा मूर्ति अपमानों की हाथों में थामा हाथ सम
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काली घटा का घमंड देखा रंग रूप एक जैसा आसमान
1. काली घटा का घमंड देखा रंग रूप एक जैसा आसमान को छूने चली है मकड़ी टूटा जाल बिखर गई कोशिश. 2. झूंड बना कर खड़ा इंसान झांक झांक कर देखता बाद�
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बहकी हवाएं, सुलगा है मन आगे क्या होगा माजरा
बहकी हवाएं, सुलगा है मन, आगे क्या होगा माजरा। सितम की घड़ी है, या भरम है रे! बावरा।। मुहब्बत को कैसे कह दे हम, लगता है हमको खुद से डर। �
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ऐसा क्यों मेरे साथ हुई एक वहीं बात हुई
ऐसा क्यों मेरे साथ हुई, एक वहीं बात हुई। बिछड़े है तुमसे ये यार कैसे, कि फिर ना मुलाकात हुई। बिन सावन के आँखों से बरसात हुई, दिन के उज
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किसी बुनकर के चरखे की तरह चरखा विचारों का घूमता है
किसी बुनकर के चरखे की तरह, चरखा विचारों का घूमता है, बुनता रहता वो रात दिन ये मन रूपी धागा। धागा, जो धागा-धागा करके, एक पर्दा बन जाता ह�
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सपनों की दुनिया में उलझी रह जाती है
अबला नारी शक्तिहीन, अपराधीत और भयभीत, धीरे-धीरे संघर्षों में ही गुम हो जाती है। समाज की जालीम नज़रों से बच्ची, सपनों की दुनिया में उलझ�
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गहरी संध्या में उठा वीरान सा ध्वनि
विधवा की आवाज़ काली रात छाती पर आवाज़ लगी, विधवा ने निहारा और विचलित हो गई। गहरी संध्या में उठा वीरान सा ध्वनि, उसकी माटी से निकली कु�
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यह साक्षात्कार बिंदेश कुमार झा द्वारा लिया गया है जो मूल रूप से एक लेखक हैं
साक्षात्कार डॉ पीयूष गोयल यह साक्षात्कार बिंदेश कुमार झा द्वारा लिया गया है। जो मूल रूप से एक लेखक हैं। यह वर्ष 2023 में जुलाई माह में म�
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पग पग पर इम्तिहान की लौ से गुजरना है
(शेर) पग_पग पर इम्तिहान की लौ से गुजरना है, फिर भी मुस्कुराते हुए सबसे रूबरू हो रहा हूं। (स्वरचित मौलिक) संदीप कुमार सिंह✍🏼 जिला:_समस्त
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अपने जज़्बातों को मैं यहां अंकित कर रहा हूं
(मुक्तक छंद) अपने जज्बातों को मैं यहां अंकित कर रहा हूं। मोती जैसे अल्फाजों से दास्तान लिख रहा हूं। जिन्दगी सु:ख_दुःख का एक अद्भुत संग
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अधरों की मुस्कान है-जीवन में वरदान
(दोहा छंद) अधरों की मुस्कान है, जीवन में वरदान। राहत मिलता है सदा, बढ़ता है तब मान।। (स्वरचित मौलिक) संदीप कुमार सिंह✍🏼 जिला:_समस्तीपु�
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मन में देते चैन को-जैसे हो अभिमान
(दोहा छंद) अधरों की मुस्कान की, दिल से हूं कद्रदान। मन में देते चैन को, जैसे हो अभिमान।। (स्वरचित मौलिक) संदीप कुमार सिंह✍🏼 जिला:_समस्त
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