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शिक्षा के अभाव में अभी भी कुछ दयनीय हैं
(कथन) विकास कि ऊंची उड़ान तो हम भरें हैं, लेकिन भूख की तड़प अभी भी यहां है। शिक्षा के अभाव में अभी भी कुछ दयनीय हैं। जो मानव समाज लिए घोर
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सर्वप्रथम तो रोटी ही आवश्यक है
(कथन) सर्वप्रथम तो रोटी ही आवश्यक है, उसके बाद कपड़ा और मकान। (स्वरचित मौलिक) संदीप कुमार सिंह✍🏼 जिला:_समस्तीपुर(देवड़ा)बिहार
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सब रिश्तों को ढूंढ कर परखा है -अपनी जज्बातों में
सब रिश्तों को ढूंढ कर परखा है अपनी जज्बातों में पर मां के जैसी किसी को नही देखा केयर करने बाला।
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बीते दिन वनवास के-बहुत उठाए कष्ट
(मुक्तक छंद) बीते दिन वनवास के, बहुत उठाए कष्ट। खुशी मिली तब राम को , दुष्टों का कर नष्ट। धर्म ध्वज का जय हुआ, खुशी अयोध्या धाम_ प्रजा उत्
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कोई बसन्त भाता नहीं है-हंसने हंसाने को सब कुछ यहां है
तुमसे दूर हो कुछ भाता नहीं है। झिलमिल दिए बुझने लगे हैं मन में दीया जगमगाता नहीं है। कैसे मधुप ने नई राह चुन ली मुझमें धैर्य अब समाता �
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झिलमिल दिए बुझने लगे हैं- मन में दीया जगमगाता नहीं है
तुमसे दूर हो कुछ भाता नहीं है। झिलमिल दिए बुझने लगे हैं मन में दीया जगमगाता नहीं है। कैसे मधुप ने नई राह चुन ली मुझमें धैर्य अब समाता �
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एकतरफा प्यार था मेरा -ना कभी बता पाया
एकतरफा प्यार था मेरा ना कभी बता पाया ना कभी जता पाया। और न बो सक्स मेरा हो पाया।
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हे वेदों के अकाल पुरुष तुम कौन हो
कविता- हे वेदों के अकाल पुरुष!तुम कौन हो? पद- श्रीहरि भक्ति पद। रस- भक्ति रस छन्द- मुक्तक (मुक्त छन्द) कविता- (१) तुम कैलाशी! तुम अविनाशी!
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हार हृदय की वही कहानी-तुम ही तो कह जाते हो
हार हृदय की वही कहानी तुम ही तो कह जाते हो। साथ साथ मेरे आकर मुझको ही छल जाते हो। वही वेदना फिर उठ कर जीवन राग सुनाती है दिखा छलावा रूप
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तुम बस मुस्कुराना-हजारों दीप जल जाए
हजारों दीप जल जाए तुम बस मुस्कुराना। निगाहें मेरी थम जाए तुम बस मुस्कुराना। दर्द जब भी बढ़े कि सीना चीर जाए हौसला उससे मिलने का कभी
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मैने बेवफा से प्यार किया-ये दर्द मुझे मिलना ही था
तू धोखा है ये सबने कहा पर मैने ये सब इनकार किया। ये दर्द मुझे मिलना ही था मैने बेवफा से प्यार किया। केशव सिंह 📝
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अपनी दर्द किस्से सुनाऊ-मजदुर जैसी भी जिंदगी ना हमार
मेरे पैर में फटे व्यार किस्से मै सुनाऊ ना घर सुने ना सरकार सुने क्या घुट घुट के मर जाऊ इस महगई की दौड में ना पेट भरे ,ना खुश मेरे परिव�
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