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अक्सर इक सवाल ज़ेहन को सताता है इक ज़ख़्म भरते ही दूजा क्यों मिल जाता है राहत मिलती है उन के छुने से मुझे चारागरों का कोई इलाज़ काम नह� read more >>
शीर्षक (रोटी) मेरे अल्फ़ाज़ (सचिन कुमार सोनकर) दर दर भटकता इन्सान है रोटी के लिये परेशान है। कोई घी लगाकर खाता है , तो कोई सूखी ही चबाता है� read more >>
ऐ चांद की चांदनी ऐ तारों का टिमटिमाना अंधेरों को चीरते हुए रोशनी का बिखरना भी खूब है। धन्यवाद read more >>
"कब तक सोएगा" उठ जा अब तो तू कब तक सोएगा सुबह हो गई सूरज खिड़की से अंदर झांक रहा लोग कितने आगे निकल गए हैं तू भी निकल पड़ वरना जी read more >>
"दर्द अपनों से" सताए चाहे दुनिया जितनी फिर भी हम हंस लेते हैं आस्तीन में पलने वाले सांप ही अक्सर डस लेते हैं ll धन-संपत्ति सब कुछ � read more >>
एक क्रिएटिव ब्लॉगर हमेशा कुछ नयापन के साथ ही अपना लेखन करता है।यही एक अच्छे ब्लॉगर की पहचान भी है।घूमते फिरते कुछ लिखते समय कुछ टिप्स read more >>
देख निशाना वो तीर चला देते हैं अपने आप को छोड़कर दूसरो पर समर्पित हो जाते हैं पैसों के लिए नहीं बल्कि निस्वार्थ रहते हैं ऐसे ही व्यक् read more >>
जिन्दगी चलती है चलते रहो, वक्त के साथ थोड़ा बदलते रहो ... राह मुश्किल भी निकल जाएगी, ठोकरें खा के भी थोड़ा संभलते रहो... अंधेरा तो जुगनू स read more >>
शीर्षक (गर्मी का मौसम) मेरे अल्फ़ाज़ (सचिन कुमार सोनकर) उफ़ ये गर्मी हाय ये गर्मी। उफ़ ये कैसी गर्मी है, चारों तरफ ही आग है, ये सब गर्मी का ही read more >>
दुनियां में आए हो, तो कुछ करके जाना ऐ कहना आसान है पर ईमानदारी से दो पैसा कमाकर अपना नाम रोशन करना ऐ बहुत मुश्किल है धन्यव� read more >>
शहर से निकले कि वे शहर हो गए , घड़ी भर न संग ले बेखबर हो गए। अब तो पूछा किये किस गली में हो तुम, हर अंधेरे से बढ़कर रोशनी हो गए। शायद नहीं थ read more >>
नफरत में इतने न घिरे रहो कि अपनों की कदर करना भूल जाओ जब नफरत का घमंड टूटेगा इर्द - गिर्द अपना न नजर आयेगा। धन्यवाद read more >>
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