शीर्षक (रोटी)
मेरे अल्फ़ाज़ (सचिन कुमार सोनकर)
दर दर भटकता इन्सान है रोटी के लिये परेशान है।
कोई घी लगाकर खाता है ,
तो कोई सूखी ही चबाता है� read more >>
"कब तक सोएगा"
उठ जा अब तो
तू कब तक सोएगा
सुबह हो गई
सूरज खिड़की से
अंदर झांक रहा
लोग कितने आगे
निकल गए हैं
तू भी निकल पड़
वरना जी read more >>
"दर्द अपनों से"
सताए चाहे दुनिया जितनी
फिर भी हम हंस लेते हैं
आस्तीन में पलने वाले
सांप ही अक्सर डस लेते हैं ll
धन-संपत्ति सब कुछ � read more >>
जिन्दगी चलती है चलते रहो,
वक्त के साथ थोड़ा बदलते रहो ...
राह मुश्किल भी निकल जाएगी,
ठोकरें खा के भी थोड़ा संभलते रहो...
अंधेरा तो जुगनू स read more >>
शीर्षक (गर्मी का मौसम)
मेरे अल्फ़ाज़ (सचिन कुमार सोनकर)
उफ़ ये गर्मी हाय ये गर्मी।
उफ़ ये कैसी गर्मी है,
चारों तरफ ही आग है,
ये सब गर्मी का ही read more >>
शहर से निकले कि वे शहर हो गए ,
घड़ी भर न संग ले बेखबर हो गए।
अब तो पूछा किये किस गली में हो तुम,
हर अंधेरे से बढ़कर रोशनी हो गए।
शायद नहीं थ read more >>